ghazalKuch Alfaaz

हर ज़ी-हयात का है सबब जो हयात का निकले है जी ही उस के लिए काएनात का बिखरी है ज़ुल्फ़ उस रुख़-ए-आलम-फ़रोज़ पर वर्ना बनाओ होवे न दिन और रात का दर-पर्दा वो ही मा'नी मुक़व्वम न हों अगर सूरत न पकड़े काम फ़लक के सबात का हैं मुस्तहील ख़ाक से अज्ज़ा-ए-नव-ख़ताँ क्या सहल है ज़मीं से निकलना नबात का मुस्तहलक उस के इश्क़ के जानें हैं क़दर-ए-मर्ग ईसा-ओ-ख़िज़्र को है मज़ा कब वफ़ात का अश्जार होवें ख़ामा-ओ-आब-ए-सियह-बेहार लिखना न तो भी हो सके उस की सिफ़ात का उस के फ़रोग़-ए-हुस्न से झुमके है सब में नूर शम-ए-हरम हो या कि दिया सोमनात का बिज़्ज़ात है जहाँ में वो मौजूद हर जगह है दीद चश्म-ए-दिल के खुले ऐन ज़ात का हर सफ़्हे में है महव-ए-कलाम अपना दस जगह मुसहफ़ को खोल देख टक अंदाज़ बात का हम मुज़न्निबों में सिर्फ़ करम से है गुफ़्तुगू मज़कूर ज़िक्र याँ नहीं सौम-ओ-सलात का क्या 'मीर' तुझ को नामा-स्याही का फ़िक्र है ख़त्म-ए-रुसुल सा शख़्स है ज़ामिन नजात का

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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गले तो लगना है उस सेे कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़ तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए पता करूँँगा अँधेरे में किस से मिलता है और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से? कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए हर एक बात का मतलब निकालने वालों तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए

Tehzeeb Hafi

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यूँँ ही हैरान-ओ-ख़फ़ा जों ग़ुंचा-ए-तस्वीर हों उम्र गुज़री पर न जाना मैं कि क्यूँँ दिल-गीर हों इतनी बातें मत बना मुझ शेफ़ते से नासेहा पंद के लाएक़ नहीं मैं क़ाबिल-ए-ज़ंजीर हों सुर्ख़ रहती हैं मिरी आँखें लहू रोने से शैख़ मय अगर साबित हो मुझ पर वाजिब अल-ताज़ीर हूँ ने फ़लक पर राह मुझ को ने ज़मीं पर रौ मुझे ऐसे किस महरूम का में शोर-ए-बे-तासीर हूँ जों कमाँ गरचे ख़मीदा हूँ पे छूटा और वहीं उस के कूचे की तरफ़ चलने को यारो तीर हूँ जो मिरे हिस्से में आवे तेग़-ए-जमधर सैल-ओ-कार्द ये फ़ुज़ूली है कि मैं ही कुश्ता-ए-शमशीर हूँ खोल कर दीवान मेरा देख क़ुदरत मुद्दई' गरचे हूँ मैं नौजवाँ पर शाइ'रों का पीर हूँ यूँँ सआ'दत एक जमधर मुझ को भी गुज़ारिए मुंसिफ़ी कीजे तो मैं तो महज़ बे-तक़सीर हूँ इस क़दर बे-नंग ख़बतों को नसीहत शैख़-जी बाज़ आओ वर्ना अपने नाम को मैं 'मीर' हूँ

Meer Taqi Meer

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किस हुस्न से कहूँ मैं उस की ख़ुश-अख़तरी की इस माह-रू के आगे क्या ताब मुश्तरी की रखना न था क़दम याँ जूँ बा'द बे-ताम्मुल सैर इस जहाँ की रहरव पर तू ने सरसरी की शुब्हा बहाल सग में इक उम्र सिर्फ़ की है मत पूछ इन ने मुझ से जो आदमी-गरी की पाए गुल उस चमन में छोड़ा गया न हम से सर पर हमारे अब के मन्नत है बे-परी की पेशा तो एक ही था उस का हमारा लेकिन मजनूँ के तालेओं ने शोहरत में यावरी की गिर्ये से दाग़-ए-सीना ताज़ा हुए हैं सारे ये किश्त-ए-ख़ुश्क तू ने ऐ चश्म फिर हरी की ये दौर तो मुआफ़िक़ होता नहीं मगर अब रखिए बिना-ए-ताज़ा इस चर्ख़-ए-चम्बरी की ख़ूबाँ तुम्हारी ख़ूबी ता-चंद नक़्ल करिए हम रंजा-ख़ातिरों की क्या ख़ूब दिलबरी की हम से जो 'मीर' उड़ कर अफ़्लाक-ए-चर्ख़ में हैं उन ख़ाक में मलूँ की काहे को हम सेरी की

Meer Taqi Meer

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कब तलक ये सितम उठाइएगा एक दिन यूँँही जी से जाइएगा शक्ल तस्वीर-ए-बे-ख़ुदी कब तक कसो दिन आप में भी आइएगा सब से मिल चल कि हादसे से फिर कहीं ढूँडा भी तो न पाइएगा न मूए हम असीरी में तो नसीम कोई दिन और बाव खाइएगा कहियेगा उस से क़िस्सा-ए-मजनूँ या'नी पर्दे में ग़म सुनाइएगा उस के पा-बोस की तवक़्क़ो' पर अपने तीं ख़ाक में मिलाइएगा उस के पाँव को जा लगी है हिना ख़ूब से हाथ उसे लगाइएगा शिरकत-शैख़-ओ--ब्रहमन से 'मीर' का'बा-ओ-दैर से भी जाइएगा अपनी डेढ़ ईंट की जद्दी मस्जिद किसी वीराने में बनाइयेगा

Meer Taqi Meer

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तंग आए हैं दिल उस जी से उठा बैठेंगे भूखों मरते हैं कुछ अब यार भी खा बैठेंगे अब के बिगड़ेगी अगर उन से तो इस शहर से जा कसो वीराने में तकिया ही बना बैठेंगे मा'रका गर्म तो टक होने दो ख़ूँ-रेज़ी का पहले तलवार के नीचे हमीं जा बैठेंगे होगा ऐसा भी कोई रोज़ कि मज्लिस से कभू हम तो एक-आध घड़ी उठ के जुदा बैठेंगे जा न इज़हार-ए-मोहब्बत पे हवसनाकों की वक़्त के वक़्त ये सब मुँह को छुपा बैठेंगे देखें वो ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद कहाँ जाता है अब सर-ए-राह दम-ए-सुब्ह से आ बैठेंगे भीड़ टलती ही नहीं आगे से उस ज़ालिम के गर्दनें यार किसी रोज़ कटा बैठेंगे कब तलक गलियों में सौदाई से फिरते रहिए दिल को उस ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल से लगा बैठेंगे शोला-अफ़्शाँ अगर ऐसी ही रही आह तो 'मीर' घर को हम अपने कसो रात जला बैठेंगे

Meer Taqi Meer

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हाल-ए-दिल 'मीर' का रो रो के सब ऐ माह सुना शब को अल-क़िस्सा अजब क़िस्सा-ए-जाँ-काह सुना ना-बलद हो के रह-ए-इश्क़ में पहुँचूँ तो कहीं हमरा ख़िज़र को याँ कहते हैं गुमराह सुना कोई इन तौरों से गुज़रे है तिरे ग़म में मिरी गाह तू ने न सुना हाल मिरा गाह सुना ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में हैं याँ सब तो अबस जागा 'मीर' बे-ख़बर देखा उन्हें मैं जिन्हें आगाह सुना

Meer Taqi Meer

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