ghazalKuch Alfaaz

यूँँ ही हैरान-ओ-ख़फ़ा जों ग़ुंचा-ए-तस्वीर हों उम्र गुज़री पर न जाना मैं कि क्यूँँ दिल-गीर हों इतनी बातें मत बना मुझ शेफ़ते से नासेहा पंद के लाएक़ नहीं मैं क़ाबिल-ए-ज़ंजीर हों सुर्ख़ रहती हैं मिरी आँखें लहू रोने से शैख़ मय अगर साबित हो मुझ पर वाजिब अल-ताज़ीर हूँ ने फ़लक पर राह मुझ को ने ज़मीं पर रौ मुझे ऐसे किस महरूम का में शोर-ए-बे-तासीर हूँ जों कमाँ गरचे ख़मीदा हूँ पे छूटा और वहीं उस के कूचे की तरफ़ चलने को यारो तीर हूँ जो मिरे हिस्से में आवे तेग़-ए-जमधर सैल-ओ-कार्द ये फ़ुज़ूली है कि मैं ही कुश्ता-ए-शमशीर हूँ खोल कर दीवान मेरा देख क़ुदरत मुद्दई' गरचे हूँ मैं नौजवाँ पर शाइ'रों का पीर हूँ यूँँ सआ'दत एक जमधर मुझ को भी गुज़ारिए मुंसिफ़ी कीजे तो मैं तो महज़ बे-तक़सीर हूँ इस क़दर बे-नंग ख़बतों को नसीहत शैख़-जी बाज़ आओ वर्ना अपने नाम को मैं 'मीर' हूँ

Related Ghazal

क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

371 likes

जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है

Ali Zaryoun

61 likes

इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

173 likes

सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

77 likes

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

More from Meer Taqi Meer

ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

0 likes

महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

Meer Taqi Meer

0 likes

मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ

Meer Taqi Meer

0 likes

देखेगा जो तुझ रो को सो हैरान रहेगा वाबस्ता तिरे मू का परेशान रहेगा वा'दा तो किया इस से दम-ए-सुब्ह का लेकिन उस दम तईं मुझ में भी अगर जान रहेगा मुनइ'म ने बना ज़ुल्म की रख घर तो बनाया पर आप कोई रात ही मेहमान रहेगा छूटूँ कहीं ईज़ा से लगा एक ही जल्लाद ता-हश्र मिरे सर पे ये एहसान रहेगा चिमटे रहेंगे दश्त-ए-मोहब्बत में सर-ओ-तेग़ महशर तईं ख़ाली न ये मैदान रहेगा जाने का नहीं शोर सुख़न का मिरे हरगिज़ ता-हश्र जहाँ में मिरा दीवान रहेगा दिल देने की ऐसी हरकत उन ने नहीं की जब तक जियेगा 'मीर' पशेमान रहेगा

Meer Taqi Meer

0 likes

ख़ुश-क़दाँ जब सवार होते हैं सर्व-ओ-क़ुमरी शिकार होते हैं तेरे बालों के वस्फ़ में मेरे शे'र सब पेचदार होते हैं आओ याद-ए-बुताँ प भूल न जाओ ये तग़ाफ़ुल-शिआर होते हैं देख लेवेंगे ग़ैर को तुझ पास सोहबतों में भी यार होते हैं सदक़े हो लेवें एक-दम तेरे फिर तो तुझ पर निसार होते हैं तू करे है क़रार मिलने का हम अभी बे-क़रार होते हैं हफ़्त-इक़्लीम हर गली है कहीं दिल्ली से भी दयार होते हैं रफ़्ता रफ़्ता ये तिफ़्ल-ए-ख़ुश-ज़ाहिर फ़ित्ना-ए-रोज़गार होते हैं उस के नज़दीक कुछ नहीं इज़्ज़त 'मीर'-जी यूँँ ही ख़्वार होते हैं

Meer Taqi Meer

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Meer Taqi Meer.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Meer Taqi Meer's ghazal.