ख़ुश-क़दाँ जब सवार होते हैं सर्व-ओ-क़ुमरी शिकार होते हैं तेरे बालों के वस्फ़ में मेरे शे'र सब पेचदार होते हैं आओ याद-ए-बुताँ प भूल न जाओ ये तग़ाफ़ुल-शिआर होते हैं देख लेवेंगे ग़ैर को तुझ पास सोहबतों में भी यार होते हैं सदक़े हो लेवें एक-दम तेरे फिर तो तुझ पर निसार होते हैं तू करे है क़रार मिलने का हम अभी बे-क़रार होते हैं हफ़्त-इक़्लीम हर गली है कहीं दिल्ली से भी दयार होते हैं रफ़्ता रफ़्ता ये तिफ़्ल-ए-ख़ुश-ज़ाहिर फ़ित्ना-ए-रोज़गार होते हैं उस के नज़दीक कुछ नहीं इज़्ज़त 'मीर'-जी यूँँ ही ख़्वार होते हैं
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की
Meer Taqi Meer
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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला
Meer Taqi Meer
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जब से ख़त है सियाह-ख़ाल की थांग तब से लुटती है हिन्द चारों दाँग बात अमल की चली ही जाती है है मगर औज-बिन-उनुक़ की टाँग बन जो कुछ बन सके जवानी में रात तो थोड़ी है बहुत है साँग इश्क़ का शोर कोई छुपता है नाला-ए-अंदलीब है गुल-बाँग उस ज़क़न में भी सब्ज़ी है ख़त की देखो जीधर कुएँ पड़ी है भाँग किस तरह उन से कोई गर्म मिले सीम-तन पिघले जाते हैं जों राँग चली जाती है हसब क़द्र-ए-बुलंद दूर तक उस पहाड़ की है डाँग तफ़रा बातिल था तूर पर अपने वर्ना जाते ये दौड़ हम भी फलाँग मैं ने क्या उस ग़ज़ल को सहल किया क़ाफ़िए ही थे उस के ऊट-पटाँग 'मीर' बंदों से काम कब निकला माँगना है जो कुछ ख़ुदा से माँग
Meer Taqi Meer
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मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद रख के तेशा कहे है या उस्ताद हम से बिन मर्ग क्या जुदा हो मलाल जान के साथ है दिल-ए-नाशाद मूँद आँखें सफ़र अदम का कर बस है देखा न आलम-ए-ईजाद फ़िक्र-ए-ता'मीर' में न रह मुनइम ज़िंदगानी की कुछ भी है बुनियाद ख़ाक भी सर पे डालने को नहीं किस ख़राबे में हम हुए आबाद सुनते हो टुक सुनो कि फिर मुझ बा'द न सुनोगे ये नाला ओ फ़रियाद लगती है कुछ सुमूम सी तो नसीम ख़ाक किस दिल-जले की बर्बाद भूला जाए है ग़म-ए-बुताँ में जी ग़रज़ आता है फिर ख़ुदा ही याद तेरे क़ैद-ए-क़फ़स का क्या शिकवा नाले अपने से अपने से फ़रियाद हर तरफ़ हैं असीर हम-आवाज़ बाग़ है घर तिरा तो ऐ सय्याद हम को मरना ये है कि कब हों कहीं अपनी क़ैद-ए-हयात से आज़ाद ऐसा वो शोख़ है कि उठते सुब्ह जाना सो जाए उस की है मो'ताद नहीं सूरत-पज़ीर नक़्श उस का यूँँ ही तस्दीक़ खींचे है बहज़ाद ख़ूब है ख़ाक से बुज़ुर्गों की चाहना तो मिरे तईं इमदाद पर मुरव्वत कहाँ की है ऐ 'मीर' तू ही मुझ दिल-जले को कर इरशाद ना-मुरादी हो जिस पे परवाना वो जलाता फिरे चराग़-ए-मुराद
Meer Taqi Meer
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हाल-ए-दिल 'मीर' का रो रो के सब ऐ माह सुना शब को अल-क़िस्सा अजब क़िस्सा-ए-जाँ-काह सुना ना-बलद हो के रह-ए-इश्क़ में पहुँचूँ तो कहीं हमरा ख़िज़र को याँ कहते हैं गुमराह सुना कोई इन तौरों से गुज़रे है तिरे ग़म में मिरी गाह तू ने न सुना हाल मिरा गाह सुना ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में हैं याँ सब तो अबस जागा 'मीर' बे-ख़बर देखा उन्हें मैं जिन्हें आगाह सुना
Meer Taqi Meer
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