मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद रख के तेशा कहे है या उस्ताद हम से बिन मर्ग क्या जुदा हो मलाल जान के साथ है दिल-ए-नाशाद मूँद आँखें सफ़र अदम का कर बस है देखा न आलम-ए-ईजाद फ़िक्र-ए-ता'मीर' में न रह मुनइम ज़िंदगानी की कुछ भी है बुनियाद ख़ाक भी सर पे डालने को नहीं किस ख़राबे में हम हुए आबाद सुनते हो टुक सुनो कि फिर मुझ बा'द न सुनोगे ये नाला ओ फ़रियाद लगती है कुछ सुमूम सी तो नसीम ख़ाक किस दिल-जले की बर्बाद भूला जाए है ग़म-ए-बुताँ में जी ग़रज़ आता है फिर ख़ुदा ही याद तेरे क़ैद-ए-क़फ़स का क्या शिकवा नाले अपने से अपने से फ़रियाद हर तरफ़ हैं असीर हम-आवाज़ बाग़ है घर तिरा तो ऐ सय्याद हम को मरना ये है कि कब हों कहीं अपनी क़ैद-ए-हयात से आज़ाद ऐसा वो शोख़ है कि उठते सुब्ह जाना सो जाए उस की है मो'ताद नहीं सूरत-पज़ीर नक़्श उस का यूँँ ही तस्दीक़ खींचे है बहज़ाद ख़ूब है ख़ाक से बुज़ुर्गों की चाहना तो मिरे तईं इमदाद पर मुरव्वत कहाँ की है ऐ 'मीर' तू ही मुझ दिल-जले को कर इरशाद ना-मुरादी हो जिस पे परवाना वो जलाता फिरे चराग़-ए-मुराद
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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ग़म की दौलत मुफ़्त लुटा दूँ बिल्कुल नहीं अश्कों में ये दर्द बहा दूँ बिल्कुल नहीं तू ने तो औक़ात दिखा दी है अपनी मैं अपना मेआ'र गिरा दूँ बिल्कुल नहीं एक नजूमी सब को ख़्वाब दिखाता है मैं भी अपना हाथ दिखा दूँ बिल्कुल नहीं मेरे अंदर इक ख़ामोशी चीख़ती है तो क्या मैं भी शोर मचा दूँ बिल्कुल नहीं
Mehshar Afridi
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ
Meer Taqi Meer
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यूँँ ही हैरान-ओ-ख़फ़ा जों ग़ुंचा-ए-तस्वीर हों उम्र गुज़री पर न जाना मैं कि क्यूँँ दिल-गीर हों इतनी बातें मत बना मुझ शेफ़ते से नासेहा पंद के लाएक़ नहीं मैं क़ाबिल-ए-ज़ंजीर हों सुर्ख़ रहती हैं मिरी आँखें लहू रोने से शैख़ मय अगर साबित हो मुझ पर वाजिब अल-ताज़ीर हूँ ने फ़लक पर राह मुझ को ने ज़मीं पर रौ मुझे ऐसे किस महरूम का में शोर-ए-बे-तासीर हूँ जों कमाँ गरचे ख़मीदा हूँ पे छूटा और वहीं उस के कूचे की तरफ़ चलने को यारो तीर हूँ जो मिरे हिस्से में आवे तेग़-ए-जमधर सैल-ओ-कार्द ये फ़ुज़ूली है कि मैं ही कुश्ता-ए-शमशीर हूँ खोल कर दीवान मेरा देख क़ुदरत मुद्दई' गरचे हूँ मैं नौजवाँ पर शाइ'रों का पीर हूँ यूँँ सआ'दत एक जमधर मुझ को भी गुज़ारिए मुंसिफ़ी कीजे तो मैं तो महज़ बे-तक़सीर हूँ इस क़दर बे-नंग ख़बतों को नसीहत शैख़-जी बाज़ आओ वर्ना अपने नाम को मैं 'मीर' हूँ
Meer Taqi Meer
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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की
Meer Taqi Meer
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किस हुस्न से कहूँ मैं उस की ख़ुश-अख़तरी की इस माह-रू के आगे क्या ताब मुश्तरी की रखना न था क़दम याँ जूँ बा'द बे-ताम्मुल सैर इस जहाँ की रहरव पर तू ने सरसरी की शुब्हा बहाल सग में इक उम्र सिर्फ़ की है मत पूछ इन ने मुझ से जो आदमी-गरी की पाए गुल उस चमन में छोड़ा गया न हम से सर पर हमारे अब के मन्नत है बे-परी की पेशा तो एक ही था उस का हमारा लेकिन मजनूँ के तालेओं ने शोहरत में यावरी की गिर्ये से दाग़-ए-सीना ताज़ा हुए हैं सारे ये किश्त-ए-ख़ुश्क तू ने ऐ चश्म फिर हरी की ये दौर तो मुआफ़िक़ होता नहीं मगर अब रखिए बिना-ए-ताज़ा इस चर्ख़-ए-चम्बरी की ख़ूबाँ तुम्हारी ख़ूबी ता-चंद नक़्ल करिए हम रंजा-ख़ातिरों की क्या ख़ूब दिलबरी की हम से जो 'मीर' उड़ कर अफ़्लाक-ए-चर्ख़ में हैं उन ख़ाक में मलूँ की काहे को हम सेरी की
Meer Taqi Meer
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कब तलक ये सितम उठाइएगा एक दिन यूँँही जी से जाइएगा शक्ल तस्वीर-ए-बे-ख़ुदी कब तक कसो दिन आप में भी आइएगा सब से मिल चल कि हादसे से फिर कहीं ढूँडा भी तो न पाइएगा न मूए हम असीरी में तो नसीम कोई दिन और बाव खाइएगा कहियेगा उस से क़िस्सा-ए-मजनूँ या'नी पर्दे में ग़म सुनाइएगा उस के पा-बोस की तवक़्क़ो' पर अपने तीं ख़ाक में मिलाइएगा उस के पाँव को जा लगी है हिना ख़ूब से हाथ उसे लगाइएगा शिरकत-शैख़-ओ--ब्रहमन से 'मीर' का'बा-ओ-दैर से भी जाइएगा अपनी डेढ़ ईंट की जद्दी मस्जिद किसी वीराने में बनाइयेगा
Meer Taqi Meer
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