ghazalKuch Alfaaz

जब से ख़त है सियाह-ख़ाल की थांग तब से लुटती है हिन्द चारों दाँग बात अमल की चली ही जाती है है मगर औज-बिन-उनुक़ की टाँग बन जो कुछ बन सके जवानी में रात तो थोड़ी है बहुत है साँग इश्क़ का शोर कोई छुपता है नाला-ए-अंदलीब है गुल-बाँग उस ज़क़न में भी सब्ज़ी है ख़त की देखो जीधर कुएँ पड़ी है भाँग किस तरह उन से कोई गर्म मिले सीम-तन पिघले जाते हैं जों राँग चली जाती है हसब क़द्र-ए-बुलंद दूर तक उस पहाड़ की है डाँग तफ़रा बातिल था तूर पर अपने वर्ना जाते ये दौड़ हम भी फलाँग मैं ने क्या उस ग़ज़ल को सहल किया क़ाफ़िए ही थे उस के ऊट-पटाँग 'मीर' बंदों से काम कब निकला माँगना है जो कुछ ख़ुदा से माँग

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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यहाँ तुम देखना रुतबा हमारा हमारी रेत है दरिया हमारा किसी से कल पिताजी कह रहे थे मुहब्बत खा गई लड़का हमारा तअ'ल्लुक़ ख़त्म करने जा रही है कहीं गिरवा न दे बच्चा हमारा

Kushal Dauneria

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मैं कब तन्हा हुआ था याद होगा तुम्हारा फ़ैसला था याद होगा बहुत से उजले उजले फूल ले कर कोई तुम से मिला था याद होगा बिछी थीं हर तरफ़ आँखें ही आँखें कोई आँसू गिरा था याद होगा उदासी और बढ़ती जा रही थी वो चेहरा बुझ रहा था याद होगा वो ख़त पागल हवा के आँचलों पर किसे तुम ने लिखा था याद होगा

Bashir Badr

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मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की दाद लोगों की गला अपना ग़ज़ल उस्ताद की अपनी साँसें बेच कर मैं ने जिसे आबाद की वो गली जन्नत तो अब भी है मगर शद्दाद की उम्र भर चलते रहे आँखों पे पट्टी बाँध कर ज़िंदगी को ढूँडने में ज़िंदगी बर्बाद की दास्तानों के सभी किरदार कम होने लगे आज काग़ज़ चुनती फिरती है परी बग़दाद की इक सुलगता चीख़ता माहौल है और कुछ नहीं बात करते हो 'यगाना' किस अमीनाबाद की

Rahat Indori

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घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए ये ज़ख़्म ज़ख़्म मनाज़िर लहू लहू चेहरे कहाँ चले गए वो लोग हँसते गाते हुए न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती मैं राख होने लगा हूँ दिए जलाते हुए

Azhar Iqbal

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शिकवा करूँँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का अल-क़िस्सा रफ़्ता रफ़्ता दुश्मन हुआ है जाँ का गिर्ये पे रंग आया क़ैद-ए-क़फ़स से शायद ख़ूँ हो गया जिगर में अब दाग़ गुल्सिताँ का ले झाड़ू टोकरा ही आता है सुब्ह होते जारूब-कश मगर है ख़ुर्शीद उस के हाँ का दी आग रंग-ए-गुल ने वाँ ऐ सबा चमन को याँ हम जले क़फ़स में सुन हाल आशियाँ का हर सुब्ह मेरे सर पर इक हादिसा नया है पैवंद हो ज़मीं का शेवा इस आसमाँ का इन सैद-अफ़गनों का क्या हो शिकार कोई होता नहीं है आख़िर काम उन के इम्तिहाँ का तब तो मुझे किया था तीरों से सैद अपना अब करते हैं निशाना हर मेरे उस्तुख़्वाँ का फ़ितराक जिस का अक्सर लोहू में तर रहे है वो क़स्द कब करे है इस सैद-ए-नातवाँ का कम-फ़ुर्सती जहाँ के मज में' की कुछ न पूछो अहवाल क्या कहूँ मैं इस मजलिस-ए-रवाँ का सज्दा करें हैं सुन कर औबाश सारे उस को सय्यद पिसर वो प्यारा हैगा इमाम बाँका ना-हक़ शनासी है ये ज़ाहिद न कर बराबर ताअ'त से सौ बरस की सज्दा उस आस्ताँ का हैं दश्त अब ये जीते बस्ते थे शहर सारे वीरान-ए-कुहन है मामूरा इस जहाँ का जिस दिन कि उस के मुँह से बुर्क़ा उठेगा सुनियो उस रोज़ से जहाँ में ख़ुर्शीद फिर न झाँका ना-हक़ ये ज़ुल्म करना इंसाफ़ कह पियारे है कौन सी जगह का किस शहर का कहाँ का सौदाई हो तो रक्खे बाज़ार-ए-इश्क़ में पा सर मुफ़्त बेचते हैं ये कुछ चलन है वाँ का सौ गाली एक चश्मक इतना सुलूक तो है औबाश ख़ाना जंग उस ख़ुश-चश्म बद-ज़बाँ का या रोए या रुलाया अपनी तो यूँँ ही गुज़री क्या ज़िक्र हम-सफ़ीराँ यारान-ए-शादमाँ का क़ैद-ए-क़फ़स में हैं तो ख़िदमत है नालगी की गुलशन में थे तो हम को मंसब था रौज़ा-ख़्वाँ का पूछो तो 'मीर' से क्या कोई नज़र पड़ा है चेहरा उतर रहा है कुछ आज उस जवाँ का

Meer Taqi Meer

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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

Meer Taqi Meer

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क्या मिरे आने पे तू ऐ बुत-ए-मग़रूर गया कभी उस राह से निकला तो तुझे घूर गया ले गया सुब्ह के नज़दीक मुझे ख़्वाब ऐ वाए आँख उस वक़्त खुली क़ाफ़िला जब दूर गया गोर से नाले नहीं उठते तो नय उगती है जी गया पर न हमारा सर पुर-शोर गया चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता से कल रात लहू फिर टपका हम ने जाना था कि बस अब तो ये नासूर गया ना-तवाँ हम हैं कि हैं ख़ाक गली की उस की अब तो बे-ताक़ती से दिल का भी मक़्दूर गया ले कहीं मुँह पे नक़ाब अपने कि ऐ ग़ैरत-ए-सुब्ह शम्अ''' के चहरा-ए-रख्शां से तो अब नूर गया नाला-ए-मीर नहीं रात से सुनते हम लोग क्या तिरे कूचे से ऐ शोख़ वो रंजूर गया

Meer Taqi Meer

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ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो हम तो हूँ बद-गुमान जो क़ासिद-ए-रसूल हो चाहूँ तो भर के कौली उठा लूँ अभी तुम्हें कैसे ही भारी हो मिरे आगे तो फूल हो सुर्मा जो नूर बख़्शे है आँखों को ख़ल्क़ की शायद कि राह-ए-यार की ही ख़ाक धूल हो जावें निसार होने को हम किस बिसात पर इक नीम जाँ रखें हैं सो वो जब क़ुबूल हो हम इन दिनों में लग नहीं पड़ते हैं सुब्ह-ओ-शाम वर्ना दुआ करें तो जो चाहें हुसूल हो दिल ले के लौंडे दिल्ली के कब का पचा गए अब उन से खाई पी हुई शय किया वसूल हो नाकाम इस लिए हो कि चाहो हो सब कुछ आज तुम भी तो 'मीर' साहिब-ओ-क़िबला अजूल हो

Meer Taqi Meer

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