घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए ये ज़ख़्म ज़ख़्म मनाज़िर लहू लहू चेहरे कहाँ चले गए वो लोग हँसते गाते हुए न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती मैं राख होने लगा हूँ दिए जलाते हुए
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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क्या कहेगा कभी मिलने भी अगर आएगा वो अब वफ़ादारी की क़स्में तो नहीं खाएगा वो हम समझते थे कि हम उस को भुला सकते हैं वो समझता था हमें भूल नहीं पाएगा वो कितना सोचा था पर इतना तो नहीं सोचा था याद बन जाएगा वो ख़्वाब नज़र आएगा वो सब के होते हुए इक रोज़ वो तन्हा होगा फिर वो ढूँढेगा हमें और नहीं पाएगा वो इत्तिफ़ाक़न जो कभी सामने आया 'अजमल' अब वो तन्हा तो न होगा जो ठहर जाएगा वो
Ajmal Siraj
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किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम
Ahmad Faraz
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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मुझ को वहशत हुई मिरे घर से रात तेरी जुदाई के डर से तेरी फ़ुर्क़त का हब्स था अंदर और दम घुट रहा था बाहरस जिस्म की आग बुझ गई लेकिन फिर नदामत के अश्क भी बरसे एक मुद्दत से हैं सफ़र में हम घर में रह कर भी जैसे बेघर से बार-हा तेरी जुस्तुजू में हम तुझ से मिलने के बा'द भी तरसे
Azhar Iqbal
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ज़मीन-ए-दिल इक अर्से बा'द जल-थल हो रही है कोई बारिश मेरे अंदर मुसलसल हो रही है लहू का रंग फैला है हमारे कैनवस पर तेरी तस्वीर अब जा कर मुकम्मल हो रही है हवा-ए-ताज़ा का झोंका चला आया कहाँ से कि मुद्दत बा'द सी पानी में हलचल हो रही है तुझे देखे से मुमकिन मग़्फ़िरत हो जाए उस की तेरे बीमार की बस आज और कल हो रही है वो साहब आ ही गई बंद-ए-क़बा खोलने लगे हैं पहेली थी जो इक उलझी हुई हल हो रही है
Azhar Iqbal
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हुई न ख़त्म तेरी रहगुज़ार क्या करते तेरे हिसार से ख़ुद को फ़रार क्या करते सफ़ीना ग़र्क़ ही करना पड़ा हमें आख़िर तिरे बग़ैर समुंदर को पार क्या करते बस एक सुकूत ही जिस का जवाब होना था वही सवाल मियाँ बार बार क्या करते फिर इस के बा'द मनाया न जश्न ख़ुश्बू का लहू में डूबी थी फ़स्ल-ए-बहार क्या करते नज़र की ज़द में नए फूल आ गए 'अज़हर' गई रुतों का भला इंतिज़ार क्या करते
Azhar Iqbal
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वो माहताब अभी बाम पर नहीं आया मिरी दु'आओं में शायद असर नहीं आया बहुत अजीब है यारों बुलंदियों का तिलिस्म जो एक बार गया लौट कर नहीं आया ये काएनात की वुसअत खुली नहीं मुझ पर मैं अपनी ज़ात से जब तक गुज़र नहीं आया बहुत दिनों से है बे-शक्ल सी मेरी मिट्टी बहुत दिनों से कोई कूज़ा-गर नहीं आया बस एक लम्हे को बे-पैराहन उसे देखा फिर इस के बा'द मुझे कुछ नज़र नहीं आया हम अब भी दश्त में ख़ेमा लगाए बैठे हैं हमारे हिस्से में अपना ही घर नहीं आया ज़मीन बाँझ न हो जाए कुछ कहो 'अज़हर' सुख़न की शाख़ पे कब से समर नहीं आया
Azhar Iqbal
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गुलाब चाँदनी-रातों पे वार आए हम तुम्हारे होंटों का सदक़ा उतार आए हम वो एक झील थी शफ़्फ़ाफ़ नील पानी की और उस में डूब को ख़ुद को निखार आए हम तिरे ही लम्स से उन का ख़िराज मुमकिन है तिरे बग़ैर जो 'उम्रें गुज़ार आए हम फिर उस गली से गुज़रना पड़ा तिरी ख़ातिर फिर उस गली से बहुत बे-क़रार आए हम ये क्या सितम है कि इस नश्शा-ए-मोहब्बत में तिरे सिवा भी किसी को पुकार आए हम
Azhar Iqbal
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