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मुझ को वहशत हुई मिरे घर से रात तेरी जुदाई के डर से तेरी फ़ुर्क़त का हब्स था अंदर और दम घुट रहा था बाहरस जिस्म की आग बुझ गई लेकिन फिर नदामत के अश्क भी बरसे एक मुद्दत से हैं सफ़र में हम घर में रह कर भी जैसे बेघर से बार-हा तेरी जुस्तुजू में हम तुझ से मिलने के बा'द भी तरसे

Azhar Iqbal11 Likes

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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वो माहताब अभी बाम पर नहीं आया मिरी दु'आओं में शायद असर नहीं आया बहुत अजीब है यारों बुलंदियों का तिलिस्म जो एक बार गया लौट कर नहीं आया ये काएनात की वुसअत खुली नहीं मुझ पर मैं अपनी ज़ात से जब तक गुज़र नहीं आया बहुत दिनों से है बे-शक्ल सी मेरी मिट्टी बहुत दिनों से कोई कूज़ा-गर नहीं आया बस एक लम्हे को बे-पैराहन उसे देखा फिर इस के बा'द मुझे कुछ नज़र नहीं आया हम अब भी दश्त में ख़ेमा लगाए बैठे हैं हमारे हिस्से में अपना ही घर नहीं आया ज़मीन बाँझ न हो जाए कुछ कहो 'अज़हर' सुख़न की शाख़ पे कब से समर नहीं आया

Azhar Iqbal

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हुई न ख़त्म तेरी रहगुज़ार क्या करते तेरे हिसार से ख़ुद को फ़रार क्या करते सफ़ीना ग़र्क़ ही करना पड़ा हमें आख़िर तिरे बग़ैर समुंदर को पार क्या करते बस एक सुकूत ही जिस का जवाब होना था वही सवाल मियाँ बार बार क्या करते फिर इस के बा'द मनाया न जश्न ख़ुश्बू का लहू में डूबी थी फ़स्ल-ए-बहार क्या करते नज़र की ज़द में नए फूल आ गए 'अज़हर' गई रुतों का भला इंतिज़ार क्या करते

Azhar Iqbal

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दिल की गली में चाँद निकलता रहता है एक दिया उम्मीद का जलता रहता है जैसे जैसे यादों की लौ बढ़ती है वैसे वैसे जिस्म पिघलता रहता है सरगोशी को कान तरसते रहते हैं सन्नाटा आवाज़ में ढलता रहता है मंज़र मंज़र जी लो जितना जी पाओ मौसम पल पल रंग बदलता रहता है राख हुई जाती है सारी हरियाली आँखों में जंगल सा जलता रहता है तुम जो गए तो भूल गए सारी बातें वैसे दिल में क्या क्या चलता रहता है

Azhar Iqbal

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गुलाब चाँदनी-रातों पे वार आए हम तुम्हारे होंटों का सदक़ा उतार आए हम वो एक झील थी शफ़्फ़ाफ़ नील पानी की और उस में डूब को ख़ुद को निखार आए हम तिरे ही लम्स से उन का ख़िराज मुमकिन है तिरे बग़ैर जो 'उम्रें गुज़ार आए हम फिर उस गली से गुज़रना पड़ा तिरी ख़ातिर फिर उस गली से बहुत बे-क़रार आए हम ये क्या सितम है कि इस नश्शा-ए-मोहब्बत में तिरे सिवा भी किसी को पुकार आए हम

Azhar Iqbal

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तिरी सम्त जाने का रास्ता नहीं हो रहा रह-ए-इश्क़ में कोई मो'जिज़ा नहीं हो रहा कोई आइना हो जो ख़ुद से मुझ को मिला सके मिरा अपने-आप से सामना नहीं हो रहा तू ख़ुदा-ए-हुस्न-ओ-जमाल है तो हुआ करे तेरी बंदगी से मिरा भला नहीं हो रहा कोई रात आ के ठहर गई मिरी ज़ात में मिरा रौशनी से भी राब्ता नहीं हो रहा उसे अपने होंटों का लम्स दो कि ये साँस ले ये जो पेड़ है ये हरा-भरा नहीं हो रहा

Azhar Iqbal

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