वो माहताब अभी बाम पर नहीं आया मिरी दु'आओं में शायद असर नहीं आया बहुत अजीब है यारों बुलंदियों का तिलिस्म जो एक बार गया लौट कर नहीं आया ये काएनात की वुसअत खुली नहीं मुझ पर मैं अपनी ज़ात से जब तक गुज़र नहीं आया बहुत दिनों से है बे-शक्ल सी मेरी मिट्टी बहुत दिनों से कोई कूज़ा-गर नहीं आया बस एक लम्हे को बे-पैराहन उसे देखा फिर इस के बा'द मुझे कुछ नज़र नहीं आया हम अब भी दश्त में ख़ेमा लगाए बैठे हैं हमारे हिस्से में अपना ही घर नहीं आया ज़मीन बाँझ न हो जाए कुछ कहो 'अज़हर' सुख़न की शाख़ पे कब से समर नहीं आया
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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मुझ को वहशत हुई मिरे घर से रात तेरी जुदाई के डर से तेरी फ़ुर्क़त का हब्स था अंदर और दम घुट रहा था बाहरस जिस्म की आग बुझ गई लेकिन फिर नदामत के अश्क भी बरसे एक मुद्दत से हैं सफ़र में हम घर में रह कर भी जैसे बेघर से बार-हा तेरी जुस्तुजू में हम तुझ से मिलने के बा'द भी तरसे
Azhar Iqbal
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हुई न ख़त्म तेरी रहगुज़ार क्या करते तेरे हिसार से ख़ुद को फ़रार क्या करते सफ़ीना ग़र्क़ ही करना पड़ा हमें आख़िर तिरे बग़ैर समुंदर को पार क्या करते बस एक सुकूत ही जिस का जवाब होना था वही सवाल मियाँ बार बार क्या करते फिर इस के बा'द मनाया न जश्न ख़ुश्बू का लहू में डूबी थी फ़स्ल-ए-बहार क्या करते नज़र की ज़द में नए फूल आ गए 'अज़हर' गई रुतों का भला इंतिज़ार क्या करते
Azhar Iqbal
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गुलाब चाँदनी-रातों पे वार आए हम तुम्हारे होंटों का सदक़ा उतार आए हम वो एक झील थी शफ़्फ़ाफ़ नील पानी की और उस में डूब को ख़ुद को निखार आए हम तिरे ही लम्स से उन का ख़िराज मुमकिन है तिरे बग़ैर जो 'उम्रें गुज़ार आए हम फिर उस गली से गुज़रना पड़ा तिरी ख़ातिर फिर उस गली से बहुत बे-क़रार आए हम ये क्या सितम है कि इस नश्शा-ए-मोहब्बत में तिरे सिवा भी किसी को पुकार आए हम
Azhar Iqbal
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ज़मीन-ए-दिल इक अर्से बा'द जल-थल हो रही है कोई बारिश मेरे अंदर मुसलसल हो रही है लहू का रंग फैला है हमारे कैनवस पर तेरी तस्वीर अब जा कर मुकम्मल हो रही है हवा-ए-ताज़ा का झोंका चला आया कहाँ से कि मुद्दत बा'द सी पानी में हलचल हो रही है तुझे देखे से मुमकिन मग़्फ़िरत हो जाए उस की तेरे बीमार की बस आज और कल हो रही है वो साहब आ ही गई बंद-ए-क़बा खोलने लगे हैं पहेली थी जो इक उलझी हुई हल हो रही है
Azhar Iqbal
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हो गया आप का आगमन नींद में छू कर गुज़री मुझ को जो पवन नींद में मुझ को फूलों की वर्षा में नहला गया मुस्कुराता हुआ इक गगन नींद में कैसे उद्धार होगा मेरे देश का लोग करते है चिंतन मनन नींद में
Azhar Iqbal
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