हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं अपने साथ इक शाम मनाया करते हैं सूरज के उस जानिब बसने वाले लोग अक्सर हम को पास बुलाया करते हैं यूँँही ख़ुद से रूठा करते हैं पहले देर तलक फिर ख़ुद को मनाया करते हैं चुप रहते हैं उस के सामने जा कर हम यूँँ उस को चख याद दिलाया करते हैं नींदों के वीरान जज़ीरे पर हर शब ख़्वाबों का इक शहर बसाया करते हैं इन ख़्वाबों की क़ीमत हम से पूछ कि हम इन के सहारे उम्र बिताया करते हैं अब तो कोई भी दूर नहीं तो फिर 'तैमूर' हम ख़त किस के नाम लिखाया करते हैं
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था कि रात बीत गई अभी तो रंग जमा था कि रात बीत गई मिरी तरफ़ चली आती है नींद ख़्वाब लिए अभी ये मुज़्दा सुना था कि रात बीत गई मैं रात ज़ीस्त का क़िस्सा सुनाने बैठ गया अभी शुरूअ किया था कि रात बीत गई यहाँ तो चारों तरफ़ अब तलक अँधेरा है किसी ने मुझ से कहा था कि रात बीत गई ये क्या तिलिस्म ये पल भर में रात आ भी गई अभी तो मैं ने सुना था कि रात बीत गई शब आज की वो मिरे नाम करने वाला है ये इंकिशाफ़ हुआ था कि रात बीत गई नवेद-ए-सुब्ह जो सब को सुनाता फिरता था वो मुझ से पूछ रहा था कि रात बीत गई उठे थे हाथ दुआ के लिए कि रात कटे दुआ में ऐसा भी क्या था कि रात बीत गई ख़ुशी ज़रूर थी 'तैमूर' दिन निकलने की मगर ये ग़म भी सिवा था कि रात बीत गई
Taimur Hasan
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वो कम-सुख़न न था पर बात सोच कर करता यही सलीक़ा उसे सब में मो'तबर करता न जाने कितनी ग़लत-फ़हमियाँ जनम लेतीं मैं अस्ल बात से पहलू-तही अगर करता मैं सोचता हूँ कहाँ बात इस क़दर बढ़ती अगर मैं तेरे रवय्ये से दर-गुज़र करता मिरा अदू तो था इल्म-उल-कलाम का माहिर मिरे ख़िलाफ़ ज़माने को बोल कर करता अकेले जंग लड़ी जीत ली तो सब ने कहा पहुँचते हम भी अगर तू हमें ख़बर करता मिरी भी छाँव न होती अगर तुम्हारी तरह मैं इंहिसार बुज़ुर्गों के साए पर करता सफ़र में होती है पहचान कौन कैसा है ये आरज़ू थी मिरे साथ तू सफ़र करता गए दिनों में ये मामूल था मिरा 'तैमूर' ज़ियादा वक़्त मैं इक ख़्वाब में बसर करता
Taimur Hasan
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नहीं उड़ाऊँगा ख़ाक रोया नहीं करूँँगा करूँँगा मैं इश्क़ पर तमाशा नहीं करूँँगा मिरी मोहब्बत भी ख़ास है क्यूँँकि ख़ास हूँ मैं सो आम लोगों में ज़िक्र इस का नहीं करूँँगा उसे बताओ फ़रार का नाम तो नहीं इश्क़ जो कह रहा है मैं कार-ए-दुनिया नहीं करूँँगा कभी न सोचा था गुफ़्तुगू भी करूँँगा घंटों और अपनी बातों में ज़िक्र तेरा नहीं करूँँगा इरादतन जो किया है अब तक ग़लत किया है सो अब कोई काम बिल-इरादा नहीं करूँँगा तुझे मैं अपना नहीं समझता इसी लिए तो ज़माने तुझ से मैं कोई शिकवा नहीं करूँँगा मिरी तवज्जोह फ़क़त मिरे काम पर रहेगी मैं ख़ुद को साबित करूँँगा दावा नहीं करूँँगा अगर मैं हारा तो मान लूँगा शिकस्त अपनी तिरी तरह से कोई बहाना नहीं करूँँगा अगर किसी मस्लहत में पीछे हटा हूँ 'तैमूर' तो मत समझना कि अब मैं हमला नहीं करूँँगा
Taimur Hasan
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वो जो मुमकिन न हो मुमकिन ये बना देता है ख़्वाब दरिया के किनारों को मिला देता है ज़िंदगी भर की रियाज़त मिरी बे-कार गई इक ख़याल आया था बदले में वो क्या देता है अब मुझे लगता है दुश्मन मिरा अपना चेहरा मुझ से पहले ये मिरा हाल बता देता है चंद जुमले वो अदा करता है ऐसे ढब से मेरे अफ़्कार की बुनियाद हिला देता है ये भी एजाज़-ए-मोहब्बत है कि रोने वाला रोते रोते तुझे हँसने की दुआ देता है ज़िंदगी जंग है आसाब की और ये भी सुनो इश्क़ आसाब को मज़बूत बना देता है बैठे बैठे उसे क्या होता है जाने 'तैमूर' जलता सिगरेट वो हथेली पे बुझा देता है ये जहाँ इस लिए अच्छा नहीं लगता 'तैमूर' जब भी देता है मुझे तेरा गिला देता है
Taimur Hasan
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मोती नहीं हूँ रेत का ज़र्रा तो मैं भी हूँ दरिया तिरे वजूद का हिस्सा तो मैं भी हूँ ऐ क़हक़हे बिखेरने वाले तू ख़ुश भी है हँसने की बात छोड़ कि हँसता तो मैं भी हूँ मुझ में और उस में सिर्फ़ मुक़द्दर का फ़र्क़ है वर्ना वो शख़्स जितना है उतना तो मैं भी हूँ उस की तू सोच दुनिया में जिस का कोई नहीं तू किस लिए उदास है तेरा तो मैं भी हूँ इक एक कर के डूबते तारे बुझा गए मुझ को भी डूबना है सितारा तो मैं भी हूँ इक आइने में देख के आया है ये ख़याल मैं क्यूँँ न उस से कह दूँ कि तुझ सा तो मैं भी हूँ
Taimur Hasan
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