वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था कि रात बीत गई अभी तो रंग जमा था कि रात बीत गई मिरी तरफ़ चली आती है नींद ख़्वाब लिए अभी ये मुज़्दा सुना था कि रात बीत गई मैं रात ज़ीस्त का क़िस्सा सुनाने बैठ गया अभी शुरूअ किया था कि रात बीत गई यहाँ तो चारों तरफ़ अब तलक अँधेरा है किसी ने मुझ से कहा था कि रात बीत गई ये क्या तिलिस्म ये पल भर में रात आ भी गई अभी तो मैं ने सुना था कि रात बीत गई शब आज की वो मिरे नाम करने वाला है ये इंकिशाफ़ हुआ था कि रात बीत गई नवेद-ए-सुब्ह जो सब को सुनाता फिरता था वो मुझ से पूछ रहा था कि रात बीत गई उठे थे हाथ दुआ के लिए कि रात कटे दुआ में ऐसा भी क्या था कि रात बीत गई ख़ुशी ज़रूर थी 'तैमूर' दिन निकलने की मगर ये ग़म भी सिवा था कि रात बीत गई
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कोई हसीं तो कोई दर्दनाक समझेगा मेरा मिजाज़ वही ठीक ठाक समझेगा मैं जिस के साथ कई रातों से हूँ उस का नाम बता तो दूँगा मगर तू मज़ाक़ समझेगा वो जिस हिसाब से गाता है उस से लगता है कि मेरे दुख को तो बस बी प्राक समझेगा
Kushal Dauneria
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सारे का सारा तो मेरा भी नहीं और वो शख़्स बे-वफ़ा भी नहीं ग़ौर से देखने पे बोली है शादी से पहले सोचना भी नहीं अच्छी सेहत का है मेरा महबूब धोखे देते हुए थका भी नहीं जितना बर्बाद कर दिया तू ने उतना आबाद तो मैं था भी नहीं मुझ को बस इतना दीन आता है जहाँ मैं ख़ुद नहीं ख़ुदा भी नहीं
Kushal Dauneria
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दिल फिर उस कूचे में जाने वाला है बैठे-बिठाए ठोकर खाने वाला है तर्क-ए-त'अल्लुक़ का धड़का सा है दिल को वो मुझ को इक बात बताने वाला है कितने अदब से बैठे हैं सूखे पौदे जैसे बादल शे'र सुनाने वाला है ये मत सोच सराए पर क्या बीतेगी तू तो बस इक रात बिताने वाला है ईंटों को आपस में मिलाने वाला शख़्स अस्ल में इक दीवार उठाने वाला है गाड़ी की रफ़्तार में आई है सुस्ती शायद अब स्टेशन आने वाला है आख़िरी हिचकी लेनी है अब आ जाओ बा'द में तुम को कौन बुलाने वाला है
Zubair Ali Tabish
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वो कम-सुख़न न था पर बात सोच कर करता यही सलीक़ा उसे सब में मो'तबर करता न जाने कितनी ग़लत-फ़हमियाँ जनम लेतीं मैं अस्ल बात से पहलू-तही अगर करता मैं सोचता हूँ कहाँ बात इस क़दर बढ़ती अगर मैं तेरे रवय्ये से दर-गुज़र करता मिरा अदू तो था इल्म-उल-कलाम का माहिर मिरे ख़िलाफ़ ज़माने को बोल कर करता अकेले जंग लड़ी जीत ली तो सब ने कहा पहुँचते हम भी अगर तू हमें ख़बर करता मिरी भी छाँव न होती अगर तुम्हारी तरह मैं इंहिसार बुज़ुर्गों के साए पर करता सफ़र में होती है पहचान कौन कैसा है ये आरज़ू थी मिरे साथ तू सफ़र करता गए दिनों में ये मामूल था मिरा 'तैमूर' ज़ियादा वक़्त मैं इक ख़्वाब में बसर करता
Taimur Hasan
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नहीं उड़ाऊँगा ख़ाक रोया नहीं करूँँगा करूँँगा मैं इश्क़ पर तमाशा नहीं करूँँगा मिरी मोहब्बत भी ख़ास है क्यूँँकि ख़ास हूँ मैं सो आम लोगों में ज़िक्र इस का नहीं करूँँगा उसे बताओ फ़रार का नाम तो नहीं इश्क़ जो कह रहा है मैं कार-ए-दुनिया नहीं करूँँगा कभी न सोचा था गुफ़्तुगू भी करूँँगा घंटों और अपनी बातों में ज़िक्र तेरा नहीं करूँँगा इरादतन जो किया है अब तक ग़लत किया है सो अब कोई काम बिल-इरादा नहीं करूँँगा तुझे मैं अपना नहीं समझता इसी लिए तो ज़माने तुझ से मैं कोई शिकवा नहीं करूँँगा मिरी तवज्जोह फ़क़त मिरे काम पर रहेगी मैं ख़ुद को साबित करूँँगा दावा नहीं करूँँगा अगर मैं हारा तो मान लूँगा शिकस्त अपनी तिरी तरह से कोई बहाना नहीं करूँँगा अगर किसी मस्लहत में पीछे हटा हूँ 'तैमूर' तो मत समझना कि अब मैं हमला नहीं करूँँगा
Taimur Hasan
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तुझे ज़िंदगी का शऊर था तेरा क्या बना तू ख़मोश क्यूँँ है मुझे बता तेरा क्या बना नई मंज़िलों की तलाश थी सो बिछड़ गए मैं बिछड़ के तुझ से भटक गया तेरा क्या बना मुझे इल्म था कि शिकस्त मेरा नसीब है तू उमीदवार था जीत का तेरा क्या बना मैं मुक़ाबले में शरीक था फ़क़त इस लिए कोई आ के मुझ से ये पूछता तेरा क्या बना जो नसीब से तेरी जंग थी वो मेरी भी थी मैं तो कामयाब न हो सका तेरा क्या बना तुझे देख कर तो मुझे लगा था कि ख़ुश है तू तेरे बोलने से पता चला तेरा क्या बना
Taimur Hasan
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वो जो मुमकिन न हो मुमकिन ये बना देता है ख़्वाब दरिया के किनारों को मिला देता है ज़िंदगी भर की रियाज़त मिरी बे-कार गई इक ख़याल आया था बदले में वो क्या देता है अब मुझे लगता है दुश्मन मिरा अपना चेहरा मुझ से पहले ये मिरा हाल बता देता है चंद जुमले वो अदा करता है ऐसे ढब से मेरे अफ़्कार की बुनियाद हिला देता है ये भी एजाज़-ए-मोहब्बत है कि रोने वाला रोते रोते तुझे हँसने की दुआ देता है ज़िंदगी जंग है आसाब की और ये भी सुनो इश्क़ आसाब को मज़बूत बना देता है बैठे बैठे उसे क्या होता है जाने 'तैमूर' जलता सिगरेट वो हथेली पे बुझा देता है ये जहाँ इस लिए अच्छा नहीं लगता 'तैमूर' जब भी देता है मुझे तेरा गिला देता है
Taimur Hasan
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हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं अपने साथ इक शाम मनाया करते हैं सूरज के उस जानिब बसने वाले लोग अक्सर हम को पास बुलाया करते हैं यूँँही ख़ुद से रूठा करते हैं पहले देर तलक फिर ख़ुद को मनाया करते हैं चुप रहते हैं उस के सामने जा कर हम यूँँ उस को चख याद दिलाया करते हैं नींदों के वीरान जज़ीरे पर हर शब ख़्वाबों का इक शहर बसाया करते हैं इन ख़्वाबों की क़ीमत हम से पूछ कि हम इन के सहारे उम्र बिताया करते हैं अब तो कोई भी दूर नहीं तो फिर 'तैमूर' हम ख़त किस के नाम लिखाया करते हैं
Taimur Hasan
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