ghazalKuch Alfaaz

तुझे ज़िंदगी का शऊर था तेरा क्या बना तू ख़मोश क्यूँँ है मुझे बता तेरा क्या बना नई मंज़िलों की तलाश थी सो बिछड़ गए मैं बिछड़ के तुझ से भटक गया तेरा क्या बना मुझे इल्म था कि शिकस्त मेरा नसीब है तू उमीदवार था जीत का तेरा क्या बना मैं मुक़ाबले में शरीक था फ़क़त इस लिए कोई आ के मुझ से ये पूछता तेरा क्या बना जो नसीब से तेरी जंग थी वो मेरी भी थी मैं तो कामयाब न हो सका तेरा क्या बना तुझे देख कर तो मुझे लगा था कि ख़ुश है तू तेरे बोलने से पता चला तेरा क्या बना

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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वो कम-सुख़न न था पर बात सोच कर करता यही सलीक़ा उसे सब में मो'तबर करता न जाने कितनी ग़लत-फ़हमियाँ जनम लेतीं मैं अस्ल बात से पहलू-तही अगर करता मैं सोचता हूँ कहाँ बात इस क़दर बढ़ती अगर मैं तेरे रवय्ये से दर-गुज़र करता मिरा अदू तो था इल्म-उल-कलाम का माहिर मिरे ख़िलाफ़ ज़माने को बोल कर करता अकेले जंग लड़ी जीत ली तो सब ने कहा पहुँचते हम भी अगर तू हमें ख़बर करता मिरी भी छाँव न होती अगर तुम्हारी तरह मैं इंहिसार बुज़ुर्गों के साए पर करता सफ़र में होती है पहचान कौन कैसा है ये आरज़ू थी मिरे साथ तू सफ़र करता गए दिनों में ये मामूल था मिरा 'तैमूर' ज़ियादा वक़्त मैं इक ख़्वाब में बसर करता

Taimur Hasan

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वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था कि रात बीत गई अभी तो रंग जमा था कि रात बीत गई मिरी तरफ़ चली आती है नींद ख़्वाब लिए अभी ये मुज़्दा सुना था कि रात बीत गई मैं रात ज़ीस्त का क़िस्सा सुनाने बैठ गया अभी शुरूअ किया था कि रात बीत गई यहाँ तो चारों तरफ़ अब तलक अँधेरा है किसी ने मुझ से कहा था कि रात बीत गई ये क्या तिलिस्म ये पल भर में रात आ भी गई अभी तो मैं ने सुना था कि रात बीत गई शब आज की वो मिरे नाम करने वाला है ये इंकिशाफ़ हुआ था कि रात बीत गई नवेद-ए-सुब्ह जो सब को सुनाता फिरता था वो मुझ से पूछ रहा था कि रात बीत गई उठे थे हाथ दुआ के लिए कि रात कटे दुआ में ऐसा भी क्या था कि रात बीत गई ख़ुशी ज़रूर थी 'तैमूर' दिन निकलने की मगर ये ग़म भी सिवा था कि रात बीत गई

Taimur Hasan

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हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं अपने साथ इक शाम मनाया करते हैं सूरज के उस जानिब बसने वाले लोग अक्सर हम को पास बुलाया करते हैं यूँँही ख़ुद से रूठा करते हैं पहले देर तलक फिर ख़ुद को मनाया करते हैं चुप रहते हैं उस के सामने जा कर हम यूँँ उस को चख याद दिलाया करते हैं नींदों के वीरान जज़ीरे पर हर शब ख़्वाबों का इक शहर बसाया करते हैं इन ख़्वाबों की क़ीमत हम से पूछ कि हम इन के सहारे उम्र बिताया करते हैं अब तो कोई भी दूर नहीं तो फिर 'तैमूर' हम ख़त किस के नाम लिखाया करते हैं

Taimur Hasan

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वो जो मुमकिन न हो मुमकिन ये बना देता है ख़्वाब दरिया के किनारों को मिला देता है ज़िंदगी भर की रियाज़त मिरी बे-कार गई इक ख़याल आया था बदले में वो क्या देता है अब मुझे लगता है दुश्मन मिरा अपना चेहरा मुझ से पहले ये मिरा हाल बता देता है चंद जुमले वो अदा करता है ऐसे ढब से मेरे अफ़्कार की बुनियाद हिला देता है ये भी एजाज़-ए-मोहब्बत है कि रोने वाला रोते रोते तुझे हँसने की दुआ देता है ज़िंदगी जंग है आसाब की और ये भी सुनो इश्क़ आसाब को मज़बूत बना देता है बैठे बैठे उसे क्या होता है जाने 'तैमूर' जलता सिगरेट वो हथेली पे बुझा देता है ये जहाँ इस लिए अच्छा नहीं लगता 'तैमूर' जब भी देता है मुझे तेरा गिला देता है

Taimur Hasan

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नहीं उड़ाऊँगा ख़ाक रोया नहीं करूँँगा करूँँगा मैं इश्क़ पर तमाशा नहीं करूँँगा मिरी मोहब्बत भी ख़ास है क्यूँँकि ख़ास हूँ मैं सो आम लोगों में ज़िक्र इस का नहीं करूँँगा उसे बताओ फ़रार का नाम तो नहीं इश्क़ जो कह रहा है मैं कार-ए-दुनिया नहीं करूँँगा कभी न सोचा था गुफ़्तुगू भी करूँँगा घंटों और अपनी बातों में ज़िक्र तेरा नहीं करूँँगा इरादतन जो किया है अब तक ग़लत किया है सो अब कोई काम बिल-इरादा नहीं करूँँगा तुझे मैं अपना नहीं समझता इसी लिए तो ज़माने तुझ से मैं कोई शिकवा नहीं करूँँगा मिरी तवज्जोह फ़क़त मिरे काम पर रहेगी मैं ख़ुद को साबित करूँँगा दावा नहीं करूँँगा अगर मैं हारा तो मान लूँगा शिकस्त अपनी तिरी तरह से कोई बहाना नहीं करूँँगा अगर किसी मस्लहत में पीछे हटा हूँ 'तैमूर' तो मत समझना कि अब मैं हमला नहीं करूँँगा

Taimur Hasan

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