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ibn-e-mariyam hua kare koi mere dukh ki dava kare koi let anyone the son of mary be how will i know till i find remedy shar' o aaiin par madar sahi aise qatil ka kya kare koi when sanctioned by laws of divinity for such a killer what can one decree? chaal jaise kadi kaman ka tiir dil men aise ke ja kare koi like an arrow drawn her graceful gait in this heart embedded directly baat par vaan zaban katti hai vo kahen aur suna kare koi my every word she contradicts alas if i could, but, speak and she agree bak raha huun junun men kya kya kuchh kuchh na samjhe khuda kare koi lord i pray that no one comprehends all that i rant and rave in ecstasy na suno gar bura kahe koi na kaho gar bura kare koi if someone speaks ill pay no heed stay silent if behave they sinfully rok lo gar ghhalat chale koi bakhsh do gar khata kare koi stop them if they step misguidedly forgive them if they act mistakenly kaun hai jo nahin hai hajat-mand kis ki hajat rava kare koi is there anyone who's not in need? then to whom does one do charity? kya kiya khizr ne sikandar se ab kise rahnuma kare koi what did khizr for alexander do? for guidance then who shall i go and see? jab tavaqqo' hi uth gai 'ghhalib' kyuun kisi ka gila kare koi when no expectations remain why complain of adversity? ibn-e-mariyam hua kare koi mere dukh ki dawa kare koi let anyone the son of mary be how will i know till i find remedy shar' o aain par madar sahi aise qatil ka kya kare koi when sanctioned by laws of divinity for such a killer what can one decree? chaal jaise kadi kaman ka tir dil mein aise ke ja kare koi like an arrow drawn her graceful gait in this heart embedded directly baat par wan zaban katti hai wo kahen aur suna kare koi my every word she contradicts alas if i could, but, speak and she agree bak raha hun junun mein kya kya kuchh kuchh na samjhe khuda kare koi lord i pray that no one comprehends all that i rant and rave in ecstasy na suno gar bura kahe koi na kaho gar bura kare koi if someone speaks ill pay no heed stay silent if behave they sinfully rok lo gar ghalat chale koi bakhsh do gar khata kare koi stop them if they step misguidedly forgive them if they act mistakenly kaun hai jo nahin hai hajat-mand kis ki hajat rawa kare koi is there anyone who's not in need? then to whom does one do charity? kya kiya khizr ne sikandar se ab kise rahnuma kare koi what did khizr for alexander do? for guidance then who shall i go and see? jab tawaqqo' hi uth gai 'ghaalib' kyun kisi ka gila kare koi when no expectations remain why complain of adversity?

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वो मुँह लगाता है जब कोई काम होता है जो उस का होता है समझो ग़ुलाम होता है किसी का हो के दुबारा न आना मेरी तरफ़ मोहब्बतों में हलाला हराम होता है इसे भी गिनते हैं हम लोग अहल-ए-ख़ाना में हमारे याँ तो शजर का भी नाम होता है तुझ ऐसे शख़्स के होते हैं ख़ास दोस्त बहुत तुझ ऐसा शख़्स बहुत जल्द आम होता है कभी लगी है तुम्हें कोई शाम आख़िरी शाम हमारे साथ ये हर एक शाम होता है

Umair Najmi

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आँख को आइना समझते हो तुम भी सबकी तरह समझते हो दोस्त अब क्यूँ नहीं समझते तुम तुम तो कहते थे ना समझते हो अपना ग़म तुम को कैसे समझाऊँ सब सेे हारा हुआ समझते हो मेरी दुनिया उजड़ गई इस में तुम इसे हादसा समझते हो आख़िरी रास्ता तो बाक़ी है आख़िरी रास्ता समझते हो

Himanshi babra KATIB

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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किसे ख़बर है कि उम्र बस उस पे ग़ौर करने में कट रही है कि ये उदासी हमारे जिस्मों से किस ख़ुशी में लिपट रही है अजीब दुख है हम उस के होकर भी उस को छूने से डर रहे हैं अजीब दुख है हमारे हिस्से की आग औरों में बट रही है मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूठ सुनने को फ़ोन करता सुनो यहाँ कोई मस’अला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है मुझ ऐसे पेड़ों के सूखने और सब्ज़ होने से क्या किसी को ये बेल शायद किसी मुसीबत में है जो मुझ से लिपट रही है ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज़्दाद बेच देगी जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है सो इस तअ'ल्लुक़ में जो ग़लत-फ़हमियाँ थीं अब दूर हो रही हैं रुकी हुई गाड़ियों के चलने का वक़्त है धुँध छट रही है

Tehzeeb Hafi

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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की

Mirza Ghalib

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महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का याँ वर्ना जो हिजाब है पर्दा है साज़ का रंग-ए-शिकस्ता सुब्ह-ए-बहार-ए-नज़ारा है ये वक़्त है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-नाज़ का तू और सू-ए-ग़ैर नज़र-हा-ए-तेज़ तेज़ मैं और दुख तिरी मिज़ा-हा-ए-दराज़ का सर्फ़ा है ज़ब्त-ए-आह में मेरा वगर्ना में तोमा हूँ एक ही नफ़स-ए-जाँ-गुदाज़ का हैं बस-कि जोश-ए-बादास शीशे उछल रहे हर गोशा-ए-बिसात है सर शीशा-बाज़ का काविश का दिल करे है तक़ाज़ा कि है हुनूज़ नाख़ुन पे क़र्ज़ इस गिरह-ए-नीम-बाज़ का ताराज-ए-काविश-ए-ग़म-ए-हिज्राँ हुआ 'असद' सीना कि था दफ़ीना गुहर-हा-ए-राज़ का

Mirza Ghalib

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कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए यक मर्तबा घबरा के कहो कोई कि वो आए हूँ कशमकश-ए-नज़अ' में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए है साइक़ा ओ शो'ला ओ सीमाब का आलम आना ही समझ में मिरी आता नहीं गो आए ज़ाहिर है कि घबरा के न भागेंगे नकीरैन हाँ मुँह से मगर बादा-ए-दोशीना की बू आए जल्लाद से डरते हैं न वाइ'ज़ से झगड़ते हम समझे हुए हैं उसे जिस भेस में जो आए हाँ अहल-ए-तलब कौन सुने ताना-ए-ना-याफ़्त देखा कि वो मिलता नहीं अपने ही को खो आए अपना नहीं ये शेवा कि आराम से बैठें उस दर पे नहीं बार तो का'बे ही को हो आए की हम-नफ़सों ने असर-ए-गिर्या में तक़रीर अच्छे रहे आप इस से मगर मुझ को डुबो आए उस अंजुमन-ए-नाज़ की क्या बात है 'ग़ालिब' हम भी गए वाँ और तिरी तक़दीर को रो आए

Mirza Ghalib

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दिल लगा कर लग गया उन को भी तन्हा बैठना बारे अपनी बेकसी की हम ने पाई दाद याँ हैं ज़वाल-आमादा अज्ज़ा आफ़रीनश के तमाम महर-ए-गर्दूं है चराग़-ए-रहगुज़ार-ए-बाद याँ है तरह्हुम-आफ़रीं आराइश-ए-बे-दाद याँ अश्क-ए-चश्म-ए-दाम है हर दाना-ए-सय्याद याँ है गुदाज़-ए-मोम अंदाज़-ए-चकीदन-हा-ए-ख़ूँ नीश-ए-ज़ंबूर-ए-असल है नश्तर-ए-फ़स्साद याँ ना-गवारा है हमें एहसान-ए-साहब-दाैलताँ है ज़र-ए-गुल भी नज़र में जौहर-ए-फ़ौलाद याँ जुम्बिश-ए-दिल से हुए हैं उक़्दा-हा-ए-कार वा कम-तरीं मज़दूर-ए-संगीं-दस्त है फ़रहाद याँ क़तरा-हा-ए-ख़ून-ए-बिस्मिल ज़ेब-ए-दामाँ हैं 'असद' है तमाशा करदनी गुल-चीनी-ए-जल्लाद याँ

Mirza Ghalib

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ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम ज़ोफ़ से है ने क़नाअ'त से ये तर्क-ए-जुस्तुजू हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद' जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ' पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम

Mirza Ghalib

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