इक जिस्म से जवानी ऐसे बिछड़ रही है जैसे दुल्हन की मेहँदी बिस्तर पे झड़ रही है हथियार डाले बैठा हारा हुआ ये लड़का और वो हसीन लड़की दुनिया से लड़ रही है तंग आ चुके "अनंत'' अब ले ले पतंग अना की मैं ढील दे रहा हूँ ये और अकड़ रही है
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया
Tehzeeb Hafi
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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बताना गर दिखें तुम को भटकते पाँव के छाले कई बरसों से ग़ाएब हैं हमारे पाँव के छाले किसी के पाँव में सूखे किसी की आँख के आँसू किसी की आँख में फूटे किसी के पाँव के छाले फ़लक के पार दर्शी फ़र्श पर कब से खड़ा कोई सितारे लग रहे हैं जो हैं उस के पाँव के छाले
Anant Gupta
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मनाए जश्न वो आते हुओं का जिन्हें सदमा नहीं बिछड़े हुओं का चला जाएगा फ़न सीखे हुओं का मैं शाइ'र हूँ मगर भूले हुओं का किसी की जीत का रोना नहीं है हमें हासिल है दिल हारे हुओं का
Anant Gupta
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बदन की क्या ज़रूरत हिज्र में तो याद ज़िन्दाबाद तबाही इश्क़ में आशिक़ की ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद नया जंगल उगाने में कई नस्लें उजड़ती हैं ओ जंगल लूटने वाले तेरी औलाद ज़िन्दाबाद ये मुट्ठी भर सफल लोगों पे लानत फेंकते हैं और 'अनंत' ऐलान करते हैं कि हैं बर्बाद ज़िन्दाबाद
Anant Gupta
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दिखावा ही करना है तो फिर बड़ा कर तू शाइ'र नहीं ख़ुद को आशिक़ कहा कर बदन से उछल कर निकल आएगी रूह मेरे ख़्वाब में ग़ैर को मत छुआ कर बहुत देर कर दी ये कहने में मैं ने ज़रा तो सुनो मुझ को इतना सुनाकर
Anant Gupta
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