ghazalKuch Alfaaz

इक जिस्म से जवानी ऐसे बिछड़ रही है जैसे दुल्हन की मेहँदी बिस्तर पे झड़ रही है हथियार डाले बैठा हारा हुआ ये लड़का और वो हसीन लड़की दुनिया से लड़ रही है तंग आ चुके "अनंत'' अब ले ले पतंग अना की मैं ढील दे रहा हूँ ये और अकड़ रही है

Related Ghazal

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

268 likes

पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

158 likes

तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया इतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा मत पूछ उस ने जिस को भी जाने का कहा, बैठ गया अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया उस की मर्ज़ी वो जिसे पास बिठा ले अपने इस पे क्या लड़ना फुलाँ मेरी जगह बैठ गया बात दरियाओं की, सूरज की, न तेरी है यहाँ दो क़दम जो भी मेरे साथ चला बैठ गया बज़्म-ए-जानाँ में नशिस्तें नहीं होतीं मख़्सूस जो भी इक बार जहाँ बैठ गया बैठ गया

Tehzeeb Hafi

203 likes

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

92 likes

More from Anant Gupta

बताना गर दिखें तुम को भटकते पाँव के छाले कई बरसों से ग़ाएब हैं हमारे पाँव के छाले किसी के पाँव में सूखे किसी की आँख के आँसू किसी की आँख में फूटे किसी के पाँव के छाले फ़लक के पार दर्शी फ़र्श पर कब से खड़ा कोई सितारे लग रहे हैं जो हैं उस के पाँव के छाले

Anant Gupta

5 likes

मनाए जश्न वो आते हुओं का जिन्हें सदमा नहीं बिछड़े हुओं का चला जाएगा फ़न सीखे हुओं का मैं शाइ'र हूँ मगर भूले हुओं का किसी की जीत का रोना नहीं है हमें हासिल है दिल हारे हुओं का

Anant Gupta

6 likes

बदन की क्या ज़रूरत हिज्र में तो याद ज़िन्दाबाद तबाही इश्क़ में आशिक़ की ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद नया जंगल उगाने में कई नस्लें उजड़ती हैं ओ जंगल लूटने वाले तेरी औलाद ज़िन्दाबाद ये मुट्ठी भर सफल लोगों पे लानत फेंकते हैं और 'अनंत' ऐलान करते हैं कि हैं बर्बाद ज़िन्दाबाद

Anant Gupta

8 likes

दिखावा ही करना है तो फिर बड़ा कर तू शाइ'र नहीं ख़ुद को आशिक़ कहा कर बदन से उछल कर निकल आएगी रूह मेरे ख़्वाब में ग़ैर को मत छुआ कर बहुत देर कर दी ये कहने में मैं ने ज़रा तो सुनो मुझ को इतना सुनाकर

Anant Gupta

9 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Anant Gupta.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Anant Gupta's ghazal.