बदन की क्या ज़रूरत हिज्र में तो याद ज़िन्दाबाद तबाही इश्क़ में आशिक़ की ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद नया जंगल उगाने में कई नस्लें उजड़ती हैं ओ जंगल लूटने वाले तेरी औलाद ज़िन्दाबाद ये मुट्ठी भर सफल लोगों पे लानत फेंकते हैं और 'अनंत' ऐलान करते हैं कि हैं बर्बाद ज़िन्दाबाद
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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बताना गर दिखें तुम को भटकते पाँव के छाले कई बरसों से ग़ाएब हैं हमारे पाँव के छाले किसी के पाँव में सूखे किसी की आँख के आँसू किसी की आँख में फूटे किसी के पाँव के छाले फ़लक के पार दर्शी फ़र्श पर कब से खड़ा कोई सितारे लग रहे हैं जो हैं उस के पाँव के छाले
Anant Gupta
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मनाए जश्न वो आते हुओं का जिन्हें सदमा नहीं बिछड़े हुओं का चला जाएगा फ़न सीखे हुओं का मैं शाइ'र हूँ मगर भूले हुओं का किसी की जीत का रोना नहीं है हमें हासिल है दिल हारे हुओं का
Anant Gupta
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दिखावा ही करना है तो फिर बड़ा कर तू शाइ'र नहीं ख़ुद को आशिक़ कहा कर बदन से उछल कर निकल आएगी रूह मेरे ख़्वाब में ग़ैर को मत छुआ कर बहुत देर कर दी ये कहने में मैं ने ज़रा तो सुनो मुझ को इतना सुनाकर
Anant Gupta
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इक जिस्म से जवानी ऐसे बिछड़ रही है जैसे दुल्हन की मेहँदी बिस्तर पे झड़ रही है हथियार डाले बैठा हारा हुआ ये लड़का और वो हसीन लड़की दुनिया से लड़ रही है तंग आ चुके "अनंत'' अब ले ले पतंग अना की मैं ढील दे रहा हूँ ये और अकड़ रही है
Anant Gupta
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