ghazalKuch Alfaaz

बदन की क्या ज़रूरत हिज्र में तो याद ज़िन्दाबाद तबाही इश्क़ में आशिक़ की ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद नया जंगल उगाने में कई नस्लें उजड़ती हैं ओ जंगल लूटने वाले तेरी औलाद ज़िन्दाबाद ये मुट्ठी भर सफल लोगों पे लानत फेंकते हैं और 'अनंत' ऐलान करते हैं कि हैं बर्बाद ज़िन्दाबाद

Related Ghazal

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

190 likes

सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

140 likes

इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

95 likes

More from Anant Gupta

बताना गर दिखें तुम को भटकते पाँव के छाले कई बरसों से ग़ाएब हैं हमारे पाँव के छाले किसी के पाँव में सूखे किसी की आँख के आँसू किसी की आँख में फूटे किसी के पाँव के छाले फ़लक के पार दर्शी फ़र्श पर कब से खड़ा कोई सितारे लग रहे हैं जो हैं उस के पाँव के छाले

Anant Gupta

5 likes

मनाए जश्न वो आते हुओं का जिन्हें सदमा नहीं बिछड़े हुओं का चला जाएगा फ़न सीखे हुओं का मैं शाइ'र हूँ मगर भूले हुओं का किसी की जीत का रोना नहीं है हमें हासिल है दिल हारे हुओं का

Anant Gupta

6 likes

दिखावा ही करना है तो फिर बड़ा कर तू शाइ'र नहीं ख़ुद को आशिक़ कहा कर बदन से उछल कर निकल आएगी रूह मेरे ख़्वाब में ग़ैर को मत छुआ कर बहुत देर कर दी ये कहने में मैं ने ज़रा तो सुनो मुझ को इतना सुनाकर

Anant Gupta

9 likes

इक जिस्म से जवानी ऐसे बिछड़ रही है जैसे दुल्हन की मेहँदी बिस्तर पे झड़ रही है हथियार डाले बैठा हारा हुआ ये लड़का और वो हसीन लड़की दुनिया से लड़ रही है तंग आ चुके "अनंत'' अब ले ले पतंग अना की मैं ढील दे रहा हूँ ये और अकड़ रही है

Anant Gupta

9 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Anant Gupta.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Anant Gupta's ghazal.