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इक परी सी प्यारी लड़की सोने की नर्म हाथों में , अँगूठी सोने की उस का चेहरा, जैसे चाँदी का है, और उस की आँखें, जैसे लगती सोने की आई लव यूँ, बोल मुझ को, फिर तू देख हाथ पहना दूँगा, चूड़ी सोने की हम फ़क़ीरों में गिने जाते है, और उस के कंगन , उस की चूड़ी सोने की नींद आती ही नहीं थी तब मुझे जब ज़रूरत थी मुझे भी सोने की उस की क़ीमत कितनी है ? मत पूछ दोस्त उस के आगे दुनिया फीकी सोने की श्याम तो, मीरा न हो पाया तेरा क्या करेगी अब ये मूर्ति सोने की वो तेरी हो ही नहीं सकती ' सलीम ' माटी का तू और वो पूरी सोने की

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जहाँ-जहाँ पे तुझे ग़ैर ने छुआ हुआ था वहाँ-वहाँ पे मेरा जिस्म भी जला हुआ था शिकस्त होनी थी ये मेरा पहला इश्क़ था और वो बे-वफ़ा यही करते हुए बड़ा हुआ था फिर एक रोज़ मुझे ये पता लगा उस के पुराने आशिक़ों के साथ भी बुरा हुआ था पिता के कहने से लड़की ने घर बसा लिया पर माॅं इस कहानी में लड़के के साथ क्या हुआ था

Kushal Dauneria

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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी

Zubair Ali Tabish

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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अश'आर मेरे यूँँ तो ज़माने के लिए हैं कुछ शे'र फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

Jaan Nisar Akhtar

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सोचा था इश्क़ होगा नहीं इक परी के बा'द पर प्यास और बढ़ गई है उस नदी के बा'द नाकाम हो जो इश्क़ में तो शा'इरी करो जादूगरी से काम लो चारागरी के बा'द तब क्या करेगा दोस्त अगर वो नहीं मिली जो ज़िन्दगी तू चाहता है ख़ुद-कुशी के बा'द फिर भी यक़ीन कर रहा हूँ उस ख़ुदा पे मैं जो बेबसी बना रहा है आदमी के बा'द कुछ ज़ख़्म मुस्कुराहटों के ऐसे रह गए जैसे कि तीरगी के निशाँ चाँदनी के बा'द ये दिलजलों की फ़ौज मेरे साथ जाएगी कुछ भी नहीं बचेगा यहाँ शा'इरी के बा'द हम इश्क़ से निकल चुकी अफ़सुर्दगी में हैं इक अजनबी के साथ हैं इक अजनबी के बा'द

Abhishar Geeta Shukla

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