ghazalKuch Alfaaz

इस शहर-ए-तमन्ना में कोई मुझ सा मकीं है आँधी में चराग़ों पे जिसे पूरा यक़ीं है उस सेे ही मुख़ातिब हूँ जो अफ़लाक नशीं है इस दुनिया में सुख नामी कोई शय भी कहीं है ता'बीर भले छीन ले आँखों की बसारत इक ख़्वाब हक़ीक़त में हक़ीक़त से हसीं है बारिश की दुआ तू है तो फिर कोस-ए-क़ज़ा मैं गर तुझ सा नहीं कोई तो मुझ सा भी नहीं है जिस जा पे धरा रहता था दरवेश का कासा दावे से ये कहता हूँ ख़ज़ाना भी वहीं है

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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यूँँ तो हर सम्त है इमदाद के बाज़ार खुले तेरे आगे ही मगर दस्त-ए-गुनहगार खुले आपने जुर्म किया आप का सर काटेंगे आपने इश्क़ किया आप की दस्तार खुले मेरे तोहफ़ों ने मोहब्बत का भरम तोड़ दिया चूड़ियाँ तंग निकल आई हैं और हार खुले

Ahmad Abdullah

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मफ़रूर परिंदों को ये ऐलान गया है सय्याद नशेमन का पता जान गया है या'नी जिसे दीमक लगी जाती थी वो मैं था अब जा के मेरा मेरी तरफ़ ध्यान गया है शीशे में भले उस ने मेरी नक़्ल उतारी ख़ुश हूँ कि मुझे कोई तो पहचान गया है अब बात तेरी कुन पे है कुछ कर मेरे मौला इक शख़्स तेरे दर से परेशान गया है ये नाम-ओ-नसब जा के ज़माने को बताओ दरवेश तो दस्तक से ही पहचान गया है

Ahmad Abdullah

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ज़िंदगी बेशुमार रस्ते हैं ख़ुद को मुझ सेे गुज़ार रस्ते हैं एक रस्ता है सिर्फ़ मस्जिद को मय-कदे को हज़ार रस्ते हैं काफ़िला मर रहा है सुनने को बोल दे शह-सवार रस्ते हैं इश्क़ ने ही कहा था मूसा को हो जा दरिया के पार रस्ते हैं इस इलाके में एक शाइ'र है इस लिए सोगवार रस्ते हैं

Ahmad Abdullah

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अज़िय्यत है कि रोज़-ओ-शब घुटन महसूस होती है भले हों पास मेरे सब घुटन महसूस होती है घुटन मेरी दीवानी है घुटन का मैं दीवाना हूँ ज़माने को बिना मतलब घुटन महसूस होती है मुझे तुझ पर नहीं ख़ुद पर बहुत अफ़सोस होता है तेरे होते हुए भी जब घुटन महसूस होती है वही जिस बाग़ में सब लोग ताज़ा साँस लेते हैं मुझे उस बाग़ में भी अब घुटन महसूस होती है

Ahmad Abdullah

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कर रहे हैं सब अदब सब ठीक है और वो भी बे-सबब सब ठीक है पूछना था वाक़ई सब ठीक था कह रहे थे आप जब सब ठीक है सोचो दरिया हाल पूछे एक दिन और कह दें तश्ना-लब सब ठीक है ओढ़ ली है चेहरे पे झूठी हँसी अब बना तस्वीर अब सब ठीक है

Ahmad Abdullah

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