ज़िंदगी बेशुमार रस्ते हैं ख़ुद को मुझ सेे गुज़ार रस्ते हैं एक रस्ता है सिर्फ़ मस्जिद को मय-कदे को हज़ार रस्ते हैं काफ़िला मर रहा है सुनने को बोल दे शह-सवार रस्ते हैं इश्क़ ने ही कहा था मूसा को हो जा दरिया के पार रस्ते हैं इस इलाके में एक शाइ'र है इस लिए सोगवार रस्ते हैं
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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यूँँ तो हर सम्त है इमदाद के बाज़ार खुले तेरे आगे ही मगर दस्त-ए-गुनहगार खुले आपने जुर्म किया आप का सर काटेंगे आपने इश्क़ किया आप की दस्तार खुले मेरे तोहफ़ों ने मोहब्बत का भरम तोड़ दिया चूड़ियाँ तंग निकल आई हैं और हार खुले
Ahmad Abdullah
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अज़िय्यत है कि रोज़-ओ-शब घुटन महसूस होती है भले हों पास मेरे सब घुटन महसूस होती है घुटन मेरी दीवानी है घुटन का मैं दीवाना हूँ ज़माने को बिना मतलब घुटन महसूस होती है मुझे तुझ पर नहीं ख़ुद पर बहुत अफ़सोस होता है तेरे होते हुए भी जब घुटन महसूस होती है वही जिस बाग़ में सब लोग ताज़ा साँस लेते हैं मुझे उस बाग़ में भी अब घुटन महसूस होती है
Ahmad Abdullah
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इस शहर-ए-तमन्ना में कोई मुझ सा मकीं है आँधी में चराग़ों पे जिसे पूरा यक़ीं है उस सेे ही मुख़ातिब हूँ जो अफ़लाक नशीं है इस दुनिया में सुख नामी कोई शय भी कहीं है ता'बीर भले छीन ले आँखों की बसारत इक ख़्वाब हक़ीक़त में हक़ीक़त से हसीं है बारिश की दुआ तू है तो फिर कोस-ए-क़ज़ा मैं गर तुझ सा नहीं कोई तो मुझ सा भी नहीं है जिस जा पे धरा रहता था दरवेश का कासा दावे से ये कहता हूँ ख़ज़ाना भी वहीं है
Ahmad Abdullah
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कर रहे हैं सब अदब सब ठीक है और वो भी बे-सबब सब ठीक है पूछना था वाक़ई सब ठीक था कह रहे थे आप जब सब ठीक है सोचो दरिया हाल पूछे एक दिन और कह दें तश्ना-लब सब ठीक है ओढ़ ली है चेहरे पे झूठी हँसी अब बना तस्वीर अब सब ठीक है
Ahmad Abdullah
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मफ़रूर परिंदों को ये ऐलान गया है सय्याद नशेमन का पता जान गया है या'नी जिसे दीमक लगी जाती थी वो मैं था अब जा के मेरा मेरी तरफ़ ध्यान गया है शीशे में भले उस ने मेरी नक़्ल उतारी ख़ुश हूँ कि मुझे कोई तो पहचान गया है अब बात तेरी कुन पे है कुछ कर मेरे मौला इक शख़्स तेरे दर से परेशान गया है ये नाम-ओ-नसब जा के ज़माने को बताओ दरवेश तो दस्तक से ही पहचान गया है
Ahmad Abdullah
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