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jo banda-e-khuda tha khuda hone vaala hai kya kuchh abhi to jalva-numa hone vaala hai ye bhi durust hai ki payambar nahin huun main hai ye bhi sach ki mera kaha hone vaala hai kuchh ashk-e-khun bacha ke bhi rakhiye ki shahr men jo ho chuka hai us se siva hone vaala hai vo vaqt hai ki khalq pe har zulm-e-na-rava allah ka naam le ke rava hone vaala hai ik khauf hai ki hone hi vaala hai ja-guzin ik khvab hai ki sab se juda hone vaala hai rang-e-hava men hai ajab asrar sa koi koi bhi janta nahin kya hone vaala hai khush tha siyah-khana-e-dil men bahut lahu is qaid se magar ye riha hone vaala hai ye tiir akhiri hai bas us ki kaman men aur vo bhi dekh lena khata hone vaala hai ik lahar hai ki mujh men uchhalne ko hai 'zafar' ik lafz hai ki mujh se ada hone vaala hai jo banda-e-khuda tha khuda hone wala hai kya kuchh abhi to jalwa-numa hone wala hai ye bhi durust hai ki payambar nahin hun main hai ye bhi sach ki mera kaha hone wala hai kuchh ashk-e-khun bacha ke bhi rakhiye ki shahr mein jo ho chuka hai us se siwa hone wala hai wo waqt hai ki khalq pe har zulm-e-na-rawa allah ka nam le ke rawa hone wala hai ek khauf hai ki hone hi wala hai ja-guzin ek khwab hai ki sab se juda hone wala hai rang-e-hawa mein hai ajab asrar sa koi koi bhi jaanta nahin kya hone wala hai khush tha siyah-khana-e-dil mein bahut lahu is qaid se magar ye riha hone wala hai ye tir aakhiri hai bas us ki kaman mein aur wo bhi dekh lena khata hone wala hai ek lahar hai ki mujh mein uchhalne ko hai 'zafar' ek lafz hai ki mujh se ada hone wala hai

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते अंदर सब आ गया है बाहर का भी अँधेरा ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते करते ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है बदनाम होते होते बदनाम करते करते फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में तंग आ गया हूँ दिल को यूँँ दाम करते करते कुछ बे-ख़बर नहीं थे जो जानते हैं मुझ को मैं कूच कर रहा था बिसराम करते करते सर से गुज़र गया है पानी तो ज़ोर करता सब रोक रुकते रुकते सब थाम करते करते किस के तवाफ़ में थे और ये दिन आ गए हैं क्या ख़ाक थी कि जिस को एहराम करते करते जिस मोड़ से चले थे पहुँचे हैं फिर वहीं पर इक राएगाँ सफ़र को अंजाम करते करते आख़िर 'ज़फ़र' हुआ हूँ मंज़र से ख़ुद ही ग़ाएब उस्लूब-ए-ख़ास अपना मैं आम करते करते

Zafar Iqbal

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