ghazalKuch Alfaaz

क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ तू जान-ए-तमाशा है मैं महव-ए-तमाशा हूँ तू बाइस-ए-हस्ती है मैं हासिल-ए-हस्ती हूँ तू ख़ालिक़-उल्फ़त है और मैं तिरा बंदा हूँ जब तक न मिला था तू ऐ फ़ित्ना-ए-दो-आलम जब दर्द से ग़ाफ़िल था अब दर्द की दुनिया हूँ कुछ फ़र्क़ नहीं तुझ में और मुझ में कोई लेकिन तू और किसी का है बे-दर्द मैं तेरा हूँ मुद्दत हुई खो बैठा सरमाया-ए-तस्कीं मैं अब तो तिरी फ़ुर्क़त में दिन रात तड़पता हूँ अरमान नहीं कोई गो दिल में मिरे लेकिन अल्लाह री मजबूरी मजबूर-ए-तमन्ना हूँ 'बहज़ाद'-ए-हज़ीं मुझ पर इक कैफ़ सा तारी है अब ये मिरा आलम है हँसता हूँ न रोता हूँ

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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मोहब्बत मुस्तक़िल कैफ़-आफ़रीं मालूम होती है ख़लिश दिल में जहाँ पर थी वहीं मालूम होती है तिरे जल्वों से टकरा कर नहीं मालूम होती है नज़र भी एक मौज-ए-तह-नशीं मालूम होती है नुक़ूश-ए-पा के सदक़े बंदगी-इश्क़ के क़ुर्बां मुझे हर सम्त अपनी ही जबीं मालूम होती है मिरी रग रग में यूँँ तो दौड़ती है इश्क़ की बिजली कहीं ज़ाहिर नहीं होती कहीं मालूम होती है ये ए'जाज़-ए-नज़र कब है ये कब है हुस्न की काविश हसीं जो चीज़ होती है हसीं मालूम होती है उमीदें तोड़ दे मेरे दिल-ए-मुज़्तर ख़ुदा-हाफ़िज़ ज़बान-ए-हुस्न पर अब तक नहीं मालूम होती है उसे क्यूँँ मय-कदा कहता है बतला दे मिरे साक़ी यहाँ की सर-ज़मीं ख़ुल्द-ए-बरीं मालूम होती है अरे ऐ चारा-गर हाँ हाँ ख़लिश तू जिस को कहता है ये शय दिल में नहीं दिल के क़रीं मालूम होती है किसी के पा-ए-नाज़ुक पर झुकी है और नहीं उठती मुझे 'बहज़ाद' ये अपनी जबीं मालूम होती है

Behzad Lakhnavi

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ख़ुदा को ढूँड रहा था कहीं ख़ुदा न मिला ज़हे-नसीब कि बंदे को मुद्दआ' न मिला निगाह-ए-शौक़ में बे-नूरियों का रंग बढ़ा निगाह-ए-शौक़ को जब कोई दूसरा न मिला हम अपनी बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पर निसार रहे ख़ुदी को ढूँढ़ लिया जब हमें ख़ुदा न मिला तुम्हारी बज़्म में लब खोल कर हुआ ख़ामोश वो बद-नसीब जिसे कोई आसरा न मिला हर एक ज़र्रे में मैं ख़ुद तो आ रहा था नज़र अजीब बात तुम्हारा कहीं पता न मिला बस इक सुकून ही हम को न मिल सका ता-उम्र वगरना तेरे तसद्दुक़ में हम को क्या न मिला तिरी निगाह-ए-मोहब्बत-नवाज़ ही की क़सम कि आज तक तो हमें तुझ सा दूसरा न मिला तिरा जमाल फ़ज़ाओं में मुंतशिर था मगर निगाह-ए-शौक़ को फिर भी तिरा पता न मिला हज़ार ठोकरें खाईं हज़ार सू 'बहज़ाद' जहान-ए-हुस्न में कोई भी बा-वफ़ा न मिला

Behzad Lakhnavi

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ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ मगर हाँ दिल में कुछ कुछ ज़ेर-ओ-बम महसूस करता हूँ मोहब्बत की ये नैरंगी भी दुनिया से निराली है अलम कोई नहीं लेकिन अलम महसूस करता हूँ मिरी नज़रों में अब बाक़ी नहीं है ज़ौक़-ए-कुफ़्र-ओ-दीं मैं इक मरकज़ पे अब दैर-ओ-हरम महसूस करता हूँ जो लुत्फ़-ए-ज़िंदगानी मिल रहा था घटता जाता है ख़लिश जो दिल में रहती थी वो कम महसूस करता हूँ तुम्हारे ज़िक्र पर कब मुनहसिर है दिल की बे-ताबी किसी का ज़िक्र हो मैं चश्म-ए-नम महसूस करता हूँ कभी पाता हूँ दिल में एक हश्र-ए-दर्द-ए-बेताबी कभी मैं अपने दिल में दर्द-ओ-ग़म महसूस करता हूँ ज़बाँ पर मेरी शिकवा आ नहीं सकता ज़माने का कि हर आलम को मैं उन का करम महसूस करता हूँ ये दिल में है जो घबराहट ये आँखों में है जो आँसू इस एहसाँ को भी बाला-ए-करम महसूस करता हूँ ख़ुशी की मुझ को अब बहज़ाद कुछ हाजत नहीं बाक़ी कि ग़म को भी मैं अब उन का करम महसूस करता हूँ

Behzad Lakhnavi

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है ख़िरद-मंदी यही बा-होश दीवाना रहे है वही अपना कि जो अपने से बेगाना रहे कुफ़्र से ये इल्तिजाएँ कर रहा हूँ बार बार जाऊँ तो का'बा मगर रुख़ सू-ए-मय-ख़ाना रहे शम-ए-सोज़ाँ कुछ ख़बर भी है तुझे ओ मस्त-ए-ग़म हुस्न-ए-महफ़िल है जभी जब तक कि परवाना रहे ज़ख़्म-ए-दिल ऐ ज़ख़्म-ए-दिल नासूर क्यूँँ बनता नहीं लुत्फ़ तो जब है कि अफ़्साने में अफ़्साना रहे हम को वाइज़ का भी दिल रखना है साक़ी का भी दिल हम तो तौबा कर के भी पाबंद-ए-मय-ख़ाना रहे आख़िरश कब तक रहेंगी हुस्न की नादानियाँ हुस्न से पूछो कि कब तक इश्क़ दीवाना रहे फ़ैज़-ए-राह-ए-इश्क़ है या फ़ैज़-ए-जज़्ब-ए-इश्क़ है हम तो मंज़िल पा के भी मंज़िल से बेगाना रहे मय-कदे में हम दुआएँ कर रहे हैं बार बार इस तरफ़ भी चश्म-ए-मस्त-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना रहे आज तो साक़ी से ये 'बहज़ाद' ने बाँधा है अहद लब पे तौबा हो मगर हाथों में पैमाना रहे

Behzad Lakhnavi

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दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ' कहाँ है जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की का'बा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे 'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे

Behzad Lakhnavi

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