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log tuut jaate hain ek ghar banane men tum taras nahin khate bastiyan jalane men aur jaam tutenge is sharab-khane men mausamon ke aane men mausamon ke jaane men har dhadakte patthar ko log dil samajhte hain umren biit jaati hain dil ko dil banane men fakhta ki majburi ye bhi kah nahin sakti kaun saanp rakhta hai us ke ashiyane men dusri koi ladki zindagi men aaegi kitni der lagti hai us ko bhuul jaane men log tut jate hain ek ghar banane mein tum taras nahin khate bastiyan jalane mein aur jam tutenge is sharab-khane mein mausamon ke aane mein mausamon ke jaane mein har dhadakte patthar ko log dil samajhte hain umren bit jati hain dil ko dil banane mein fakhta ki majburi ye bhi kah nahin sakti kaun sanp rakhta hai us ke aashiyane mein dusri koi ladki zindagi mein aaegi kitni der lagti hai us ko bhul jaane mein

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा पी मिरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ मय-कदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा

Bashir Badr

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इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को अब भी ये क़ुदरत कहाँ है आदमी की ज़ात को जिन का सारा जिस्म होता है हमारी ही तरह फूल कुछ ऐसे भी खिलते हैं हमेशा रात को एक इक कर के सभी कपड़े बदन से गिर चुके सुब्ह फिर हम ये कफ़न पहनाएँगे जज़्बात को पीछे पीछे रात थी तारों का इक लश्कर लिए रेल की पटरी पे सूरज चल रहा था रात को आब ओ ख़ाक ओ बा'द में भी लहर वो आ जाए है सुर्ख़ कर देती है दम भर में जो पीली धात को सुब्ह बिस्तर बंद है जिस में लिपट जाते हैं हम इक सफ़र के बा'द फिर खुलते हैं आधी रात को सर पे सूरज के हमारे प्यार का साया रहे मामता का जिस्म माँगे ज़िंदगी की बात को

Bashir Badr

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ख़ानदानी रिश्तों में अक्सर रक़ाबत है बहुत घर से निकलो तो ये दुनिया ख़ूब-सूरत है बहुत अपने कॉलेज में बहुत मग़रूर जो मशहूर है दिल मिरा कहता है उस लड़की में चाहत है बहुत उन के चेहरे चाँद तारों की तरह रौशन रहे जिन ग़रीबों के यहाँ हुस्न-ए-क़नाअत है बहुत हम से हो सकती नहीं दुनिया की दुनिया-दारियाँ इश्क़ की दीवार के साए में राहत है बहुत धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे ग़ुर्बतों का दौर है जाड़ों की शिद्दत है बहुत इन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मीं रात से तन्हा लड़ा जुगनू में हिम्मत है बहुत

Bashir Badr

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किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते उदास रात की तन्हाइयों में रो लेते दुखों का बोझ अकेले नहीं सँभलता है कहीं वो मिलता तो उस से लिपट के रो लेते अगर सफ़र में हमारा भी हम-सफ़र होता बड़ी ख़ुशी से उन्हीं पत्थरों पे सो लेते तुम्हारी राह में शाख़ों पे फूल सूख गए कभी हवा की तरह इस तरफ़ भी हो लेते ये क्या कि रोज़ वही चाँदनी का बिस्तर हो कभी तो धूप की चादर बिछा के सो लेते

Bashir Badr

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शाम आँखों में आँख पानी में और पानी सरा-ए-फ़ानी में झिलमिलाते हैं कश्तियों में दिए पुल खड़े सो रहे हैं पानी में ख़ाक हो जाएगी ज़मीन इक दिन आसमानों की आसमानी में वो हवा है उसे कहाँ ढूँडूँ आग में ख़ाक में कि पानी में आ पहाड़ों की तरह सामने आ इन दिनों मैं भी हूँ रवानी में

Bashir Badr

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