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mai-kada tha chandni thi main na tha ik mujassam be-khudi thi main na tha ishq jab dam todta tha tum na the maut jab sar dhun rahi thi main na tha tuur par chheda tha jis ne aap ko vo miri divangi thi main na tha vo hasin baitha tha jab mere qarib lazzat-e-ham-saegi thi main na tha mai-kade ke mod par rukti hui muddaton ki tishnagi thi main na tha thi haqiqat kuchh miri to is qadar us hasin ki dil-lagi thi main na tha main aur us ghhuncha-dahan ki aarzu aarzu ki sadgi thi main na tha jis ne mah-paron ke dil pighla diye vo to meri shaeri thi main na tha gesuon ke saae men aram-kash sar-barahna zindagi thi main na tha dair o kaaba men 'adam' hairat-farosh do-jahan ki bad-zani thi main na tha mai-kada tha chandni thi main na tha ek mujassam be-khudi thi main na tha ishq jab dam todta tha tum na the maut jab sar dhun rahi thi main na tha tur par chheda tha jis ne aap ko wo meri diwangi thi main na tha wo hasin baitha tha jab mere qarib lazzat-e-ham-saegi thi main na tha mai-kade ke mod par rukti hui muddaton ki tishnagi thi main na tha thi haqiqat kuchh meri to is qadar us hasin ki dil-lagi thi main na tha main aur us ghuncha-dahan ki aarzu aarzu ki sadgi thi main na tha jis ne mah-paron ke dil pighla diye wo to meri shaeri thi main na tha gesuon ke sae mein aaram-kash sar-barahna zindagi thi main na tha dair o kaba mein 'adam' hairat-farosh do-jahan ki bad-zani thi main na tha

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं ज़ीस्त के रंज भूल जाते हैं क्यूँँ शिकन डालते हो माथे पर भूल कर आ गए हैं जाते हैं कश्तियाँ यूँँ भी डूब जाती हैं नाख़ुदा किस लिए डराते हैं इक हसीं आँख के इशारे पर क़ाफ़िले राह भूल जाते हैं

Abdul Hamid Adam

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हँस हँस के जाम जाम को छलका के पी गया वो ख़ुद पिला रहे थे मैं लहरा के पी गया तौबा के टूटने का भी कुछ कुछ मलाल था थम थम के सोच सोच के शर्मा के पी गया साग़र-ब-दस्त बैठी रही मेरी आरज़ू साक़ी शफ़क़ से जाम को टकरा के पी गया वो दुश्मनों के तंज़ को ठुकरा के पी गए मैं दोस्तों के ग़ैज़ को भड़का के पी गया सदहा मुतालिबात के बा'द एक जाम-ए-तल्ख़ दुनिया-ए-जब्र-ओ-सब्र को धड़का के पी गया सौ बार लग़्ज़िशों की क़सम खा के छोड़ दी सौ बार छोड़ने की क़सम खा के पी गया पीता कहाँ था सुब्ह-ए-अज़ल मैं भला 'अदम' साक़ी के ए'तिबार पे लहरा के पी गया

Abdul Hamid Adam

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हँस के बोला करो बुलाया करो आप का घर है आया जाया करो मुस्कुराहट है हुस्न का ज़ेवर मुस्कुराना न भूल जाया करो हद से बढ़ कर हसीन लगते हो झूटी क़स्में ज़रूर खाया करो ताकि दुनिया की दिलकशी न घटे नित-नए पैरहन में आया करो कितने सादा-मिज़ाज हो तुम 'अदम' उस गली में बहुत न जाया करो

Abdul Hamid Adam

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