ghazalKuch Alfaaz

मरने की दुआएँ क्यूँँ माँगूँ जीने की तमन्ना कौन करे ये दुनिया हो या वो दुनिया अब ख़्वाहिश-ए-दुनिया कौन करे जब कश्ती साबित-ओ-सालिम थी साहिल की तमन्ना किस को थी अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर साहिल की तमन्ना कौन करे जो आग लगाई थी तुम ने उस को तो बुझाया अश्कों ने जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे दुनिया ने हमें छोड़ा 'जज़्बी' हम छोड़ न दें क्यूँँ दुनिया को दुनिया को समझ कर बैठे हैं अब दुनिया दुनिया कौन करे

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिल-ए-सफ़-ए-आवारगी नहीं लगता कभी कभी तो वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहा से तुझे मौसमी नहीं लगता मैं चाहता हूँ वो मेरी जबीं पे बोसा दे मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता मैं उस के पास किसी काम से नहीं आता उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता

Tehzeeb Hafi

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तुम सर्वत को पढ़ती हो कितनी अच्छी लड़की हो बात नहीं सुनती हो क्यूँँ ग़ज़लें भी तो सुनती हो क्या रिश्ता है शामों से सूरज की क्या लगती हो लोग नहीं डरते रब से तुम लोगों से डरती हो मैं तो जीता हूँ तुम में तुम क्यूँँ मुझ पे मरती हो आदम और सुधर जाए तुम भी हद ही करती हो किस ने जींस करी ममनूअ' पहनो अच्छी लगती हो

Ali Zaryoun

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जो हम पे गुज़रे थे रंज सारे जो ख़ुद पे गुज़रे तो लोग समझे जब अपनी अपनी मोहब्बतों के अज़ाब झेले तो लोग समझे वो जिन दरख़्तों की छाँव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था उन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम जो फल न उतरे तो लोग समझे उस एक कच्ची सी उम्र वाली के फ़लसफ़े को कोई न समझा जब उस के कमरे से लाश निकली ख़ुतूत निकले तो लोग समझे वो ख़्वाब थे ही चँबेलियों से सो सब ने हाकिम की कर ली बै'अत फिर इक चँबेली की ओट में से जो साँप निकले तो लोग समझे वो गाँव का इक ज़ईफ़ दहक़ाँ सड़क के बनने पे क्यूँँ ख़फ़ा था जब उन के बच्चे जो शहर जा कर कभी न लौटे तो लोग समझे

Ahmad Salman

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