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मिरे ख़ुदा मुझे वो ताब-ए-नय-नवाई दे मैं चुप रहूँ भी तो नग़्मा मिरा सुनाई दे गदा-ए-कू-ए-सुख़न और तुझ से क्या माँगे यही कि मम्लिकत-ए-शेर की ख़ुदाई दे निगाह-ए-दहर में अहल-ए-कमाल हम भी हों जो लिख रहे हैं वो दुनिया अगर दिखाई दे छलक न जाऊँ कहीं मैं वजूद से अपने हुनर दिया है तो फिर ज़र्फ़-ए-किबरियाई दे मुझे कमाल-ए-सुख़न से नवाज़ने वाले समाअतों को भी अब ज़ौक़-ए-आश्नाई दे नुमू-पज़ीर है ये शोला-ए-नवा तो इसे हर आने वाले ज़माने की पेशवाई दे कोई करे तो कहाँ तक करे मसीहाई कि एक ज़ख़्म भरे दूसरा दुहाई दे मैं एक से किसी मौसम में रह नहीं सकता कभी विसाल कभी हिज्र से रिहाई दे जो एक ख़्वाब का नश्शा हो कम तो आँखों को हज़ार ख़्वाब दे और जुरअत-ए-रसाई दे

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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हिज्र करते या कोई वस्ल गुज़ारा करते हम बहर-हाल बसर ख़्वाब तुम्हारा करते एक ऐसी भी घड़ी इश्क़ में आई थी कि हम ख़ाक को हाथ लगाते तो सितारा करते अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर इतनी दूर आ गए दुनिया से किनारा करते मेहव-ए-आराइश-ए-रुख़ है वो क़यामत सर-ए-बाम आँख अगर आईना होती तो नज़ारा करते एक चेहरे में तो मुमकिन नहीं इतने चेहरे किस से करते जो कोई इश्क़ दोबारा करते जब है ये ख़ाना-ए-दिल आप की ख़ल्वत के लिए फिर कोई आए यहाँ कैसे गवारा करते कौन रखता है अँधेरे में दिया आँख में ख़्वाब तेरी जानिब ही तिरे लोग इशारा करते ज़र्फ़-ए-आईना कहाँ और तिरा हुस्न कहाँ हम तिरे चेहरे से आईना सँवारा करते

Obaidullah Aleem

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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था

Obaidullah Aleem

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ऐसी तेज़ हवा और ऐसी रात नहीं देखी लेकिन हम ने मौला जैसी ज़ात नहीं देखी उस की शान-ए-अजीब का मंज़र देखने वाला है इक ऐसा ख़ुर्शीद कि जिस ने रात नहीं देखी बिस्तर पर मौजूद रहे और सैर-ए-हफ़्त-अफ़्लाक ऐसी किसी पर रहमत की बरसात नहीं देखी उस की आल वही जो उस के नक़्श-ए-क़दम पर सिर्फ़ ज़ात की हम ने आल-ए-सादात नहीं देखी एक शजर है जिस की शाख़ें फैलती जाती हैं किसी शजर में हम ने ऐसी बात नहीं देखी इक दरिया-ए-रहमत है जो बहता जाता है ये शान-ए-बरकात किसी के साथ नहीं देखी शाहों की तारीख़ भी हम ने देखी है लेकिन उस के दर के गदाओं वाली बात नहीं देखी उस के नाम पे मारें खाना अब एज़ाज़ हमारा और किसी की ये इज़्ज़त औक़ात नहीं देखी सदियों की इस धूप छाँव में कोई हमें बतलाए पूरी हुई कौन सी उस की बात नहीं देखी अहल-ए-ज़मीं ने कौन सा हम पर ज़ुल्म नहीं ढाया कौन सी नुसरत हम ने उस के हाथ नहीं देखी

Obaidullah Aleem

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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए

Obaidullah Aleem

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कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ

Obaidullah Aleem

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