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न हुई गर मिरे मरने से तसल्ली न सही इम्तिहाँ और भी बाक़ी हो तो ये भी न सही ख़ार ख़ार-ए-अलम-ए-हसरत-ए-दीदार तो है शौक़ गुल-चीन-ए-गुलिस्तान-ए-तसल्ली न सही मय-परस्ताँ ख़ुम-ए-मय मुँह से लगाए ही बने एक दिन गर न हुआ बज़्म में साक़ी न सही नफ़स-ए-क़ैस कि है चश्म-ओ-चराग़-ए-सहरा गर नहीं शम-ए-सियह-ख़ाना-ए-लैली न सही एक हंगा में पे मौक़ूफ़ है घर की रौनक़ नौहा-ए-ग़म ही सही नग़्मा-ए-शादी न सही न सताइश की तमन्ना न सिले की पर्वा गर नहीं हैं मिरे अश'आर में मा'नी न सही इशरत-ए-सोहबत-ए-ख़ूबाँ ही ग़नीमत समझो न हुई 'ग़ालिब' अगर उम्र-ए-तबीई न सही

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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सो रहेंगे के जागते रहेंगे हम तेरे ख़्वाब देखते रहेंगे तू कही और ही ढूंढता रहेंगा हम कही और ही खिले रहेंगे राहगीरों ने राह बदलनी है पेड़ अपनी जगह खड़े रहेंगे सभी मौसम है दस्तरस में तेरी तू ने चाहा तो हम हरे रहेंगे लौटना कब है तू ने पर तुझ को आदतन ही पुकारते रहेंगे तुझ को पाने में मसअला ये है तुझ को खोने के वसवसे रहेंगे तू इधर देख मुझ सेे बातें कर यार चश्में तो फूटते रहेंगे एक मुद्दत हुई है तुझ सेे मिले तू तो कहता था राब्ते रहेंगे

Tehzeeb Hafi

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किसे ख़बर है कि उम्र बस उस पे ग़ौर करने में कट रही है कि ये उदासी हमारे जिस्मों से किस ख़ुशी में लिपट रही है अजीब दुख है हम उस के होकर भी उस को छूने से डर रहे हैं अजीब दुख है हमारे हिस्से की आग औरों में बट रही है मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूठ सुनने को फ़ोन करता सुनो यहाँ कोई मस’अला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है मुझ ऐसे पेड़ों के सूखने और सब्ज़ होने से क्या किसी को ये बेल शायद किसी मुसीबत में है जो मुझ से लिपट रही है ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज़्दाद बेच देगी जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है सो इस तअ'ल्लुक़ में जो ग़लत-फ़हमियाँ थीं अब दूर हो रही हैं रुकी हुई गाड़ियों के चलने का वक़्त है धुँध छट रही है

Tehzeeb Hafi

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की

Mirza Ghalib

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कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए यक मर्तबा घबरा के कहो कोई कि वो आए हूँ कशमकश-ए-नज़अ' में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए है साइक़ा ओ शो'ला ओ सीमाब का आलम आना ही समझ में मिरी आता नहीं गो आए ज़ाहिर है कि घबरा के न भागेंगे नकीरैन हाँ मुँह से मगर बादा-ए-दोशीना की बू आए जल्लाद से डरते हैं न वाइ'ज़ से झगड़ते हम समझे हुए हैं उसे जिस भेस में जो आए हाँ अहल-ए-तलब कौन सुने ताना-ए-ना-याफ़्त देखा कि वो मिलता नहीं अपने ही को खो आए अपना नहीं ये शेवा कि आराम से बैठें उस दर पे नहीं बार तो का'बे ही को हो आए की हम-नफ़सों ने असर-ए-गिर्या में तक़रीर अच्छे रहे आप इस से मगर मुझ को डुबो आए उस अंजुमन-ए-नाज़ की क्या बात है 'ग़ालिब' हम भी गए वाँ और तिरी तक़दीर को रो आए

Mirza Ghalib

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महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का याँ वर्ना जो हिजाब है पर्दा है साज़ का रंग-ए-शिकस्ता सुब्ह-ए-बहार-ए-नज़ारा है ये वक़्त है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-नाज़ का तू और सू-ए-ग़ैर नज़र-हा-ए-तेज़ तेज़ मैं और दुख तिरी मिज़ा-हा-ए-दराज़ का सर्फ़ा है ज़ब्त-ए-आह में मेरा वगर्ना में तोमा हूँ एक ही नफ़स-ए-जाँ-गुदाज़ का हैं बस-कि जोश-ए-बादास शीशे उछल रहे हर गोशा-ए-बिसात है सर शीशा-बाज़ का काविश का दिल करे है तक़ाज़ा कि है हुनूज़ नाख़ुन पे क़र्ज़ इस गिरह-ए-नीम-बाज़ का ताराज-ए-काविश-ए-ग़म-ए-हिज्राँ हुआ 'असद' सीना कि था दफ़ीना गुहर-हा-ए-राज़ का

Mirza Ghalib

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कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया दिल कहाँ कि गुम कीजे हम ने मुद्दआ' पाया इश्क़ से तबीअ'त ने ज़ीस्त का मज़ा पाया दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया दोस्त-दार-ए-दुश्मन है ए'तिमाद-ए-दिल मा'लूम आह बे-असर देखी नाला ना-रसा पाया सादगी ओ पुरकारी बे-ख़ुदी ओ हुश्यारी हुस्न को तग़ाफ़ुल में जुरअत-आज़मा पाया ग़ुंचा फिर लगा खिलने आज हम ने अपना दिल ख़ूँ किया हुआ देखा गुम किया हुआ पाया हाल-ए-दिल नहीं मा'लूम लेकिन इस क़दर या'नी हम ने बार-हा ढूँडा तुम ने बार-हा पाया शोर-ए-पंद-ए-नासेह ने ज़ख़्म पर नमक छिड़का आप से कोई पूछे तुम ने क्या मज़ा पाया है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब हम ने दश्त-ए-इम्काँ को एक नक़्श-ए-पा पाया बे-दिमाग़-ए-ख़जलत हूँ रश्क-ए-इम्तिहाँ ता-कै एक बेकसी तुझ को आलम-आश्ना पाया ख़ाक-बाज़ी-ए-उम्मीद कार-ख़ाना-ए-तिफ़्ली यास को दो-आलम से लब-ब-ख़ंदा वा पाया क्यूँँ न वहशत-ए-ग़ालिब बाज-ख़्वाह-ए-तस्कीं हो कुश्ता-ए-तग़ाफ़ुल को ख़स्म-ए-ख़ूँ-बहा पाया फ़िक्र-ए-नाला में गोया हल्क़ा हूँ ज़े-सर-ता-पा उज़्व उज़्व जूँ ज़ंजीर यक-दिल-ए-सदा पाया शब नज़ारा-परवर था ख़्वाब में ख़याल उस का सुब्ह मौजा-ए-गुल को नक़्श-ए-बोरिया पाया जिस क़दर जिगर ख़ूँ हो कूचा दादन-ए-गुल है ज़ख्म-ए-तेग़-ए-क़ातिल को तुर्फ़ा दिल-कुशा पाया है मकीं की पा-दारी नाम-ए-साहिब-ए-ख़ाना हम से तेरे कूचे ने नक़्श-ए-मुद्दआ पाया ने 'असद' जफ़ा-साइल ने सितम जुनूँ-माइल तुझ को जिस क़दर ढूँडा उल्फ़त-आज़मा पाया

Mirza Ghalib

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हुज़ूर-ए-शाह में अहल-ए-सुख़न की आज़माइश है चमन में ख़ुश-नवायान-ए-चमन की आज़माइश है क़द ओ गेसू में क़ैस ओ कोहकन की आज़माइश है जहाँ हम हैं वहाँ दार-ओ-रसन की आज़माइश है करेंगे कोहकन के हौसले का इम्तिहान आख़िर अभी उस ख़स्ता के नेरवे तन की आज़माइश है नसीम-ए-मिस्र को क्या पीर-ए-कनआँ' की हवा-ख़्वाही उसे यूसुफ़ की बू-ए-पैरहन की आज़माइश है वो आया बज़्म में देखो न कहियो फिर कि ग़ाफ़िल थे शकेब-ओ-सब्र-ए-अहल-ए-अंजुमन की आज़माइश है रहे दिल ही में तीर अच्छा जिगर के पार हो बेहतर ग़रज़ शुस्त-ए-बुत-ए-नावक-फ़गन की आज़माइश है नहीं कुछ सुब्हा-ओ-ज़ुन्नार के फंदे में गीराई वफ़ादारी में शैख़ ओ बरहमन की आज़माइश है पड़ा रह ऐ दिल-ए-वाबस्ता बे-ताबी से क्या हासिल मगर फिर ताब-ए-ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन की आज़माइश है रग-ओ-पय में जब उतरे ज़हर-ए-ग़म तब देखिए क्या हो अभी तो तल्ख़ी-ए-काम-ओ-दहन की आज़माइश है वो आवेंगे मिरे घर वा'दा कैसा देखना 'ग़ालिब' नए फ़ित्नों में अब चर्ख़-ए-कुहन की आज़माइश है

Mirza Ghalib

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