निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं तू भी दिल से उतर न जाए कहीं आज देखा है तुझ को देर के ब'अद आज का दिन गुज़र न जाए कहीं न मिला कर उदास लोगों से हुस्न तेरा बिखर न जाए कहीं आरज़ू है कि तू यहाँ आए और फिर उम्र भर न जाए कहीं जी जलाता हूँ और सोचता हूँ राएगाँ ये हुनर न जाए कहीं आओ कुछ देर रो ही लें 'नासिर' फिर ये दरिया उतर न जाए कहीं
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है
Ali Zaryoun
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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शहर सुनसान है किधर जाएँ ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ रात कितनी गुज़र गई लेकिन इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ यूँँ तेरे ध्यान से लरज़ता हूँ जैसे पत्ते हवा से डर जाएँ उन उजालों की धुन में फिरता हूँ छब दिखाते ही जो गुज़र जाएँ रैन अँधेरी है और किनारा दूर चाँद निकले तो पार उतर जाएँ
Nasir Kazmi
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दिल में और तो क्या रक्खा है तेरा दर्द छुपा रक्खा है इतने दुखों की तेज़ हवा में दिल का दीप जला रक्खा है धूप से चेहरों ने दुनिया में क्या अंधेर मचा रक्खा है इस नगरी के कुछ लोगों ने दुख का नाम दवा रक्खा है वादा-ए-यार की बात न छेड़ो ये धोका भी खा रक्खा है भूल भी जाओ बीती बातें इन बातों में क्या रक्खा है चुप चुप क्यूँँ रहते हो 'नासिर' ये क्या रोग लगा रक्खा है
Nasir Kazmi
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जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी जब हर इक साँस सदा होती है दिल का ये हाल हुआ तेरे बा'द जैसे वीरान सरा होती है रोना आता है हमें भी लेकिन इस में तौहीन-ए-वफ़ा होती है मुँह-अँधेरे कभी उठ कर देखो क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ किस क़दर तेज़ हवा होती है ग़म के बे-नूर गुज़रगाहों में इक किरन ज़ौक़-फ़ज़ा होती है ग़म-गुसार-ए-सफ़र-ए-राह-ए-वफ़ा मिज़ा-ए-आबला-पा होती है गुलशन-ए-फ़िक्र की मुँह-बंद कली शब-ए-महताब में वा होती है जब निकलती है निगार-ए-शब-ए-गुल मुँह पे शबनम की रिदा होती है हादसा है कि ख़िज़ाँ से पहले बू-ए-गुल गुल से जुदा होती है इक नया दौर जनम लेता है एक तहज़ीब फ़ना होती है जब कोई ग़म नहीं होता 'नासिर' बेकली दिल की सिवा होती है
Nasir Kazmi
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मुसलसल बेकली दिल को रही है मगर जीने की सूरत तो रही है मैं क्यूँँ फिरता हूँ तन्हा मारा मारा ये बस्ती चैन से क्यूँँ सो रही है चले दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर ये नगरी आज ख़ाली हो रही है न समझो तुम इसे शोर-ए-बहाराँ ख़िज़ाँ पत्तों में छुप कर रो रही है हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर' उदासी बाल खोले सो रही है
Nasir Kazmi
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गली गली मिरी याद बिछी है प्यारे रस्ता देख के चल मुझ से इतनी वहशत है तो मेरी हदों से दूर निकल एक समय तिरा फूल सा नाज़ुक हाथ था मेरे शानों पर एक ये वक़्त कि मैं तन्हा और दुख के काँटों का जंगल याद है अब तक तुझ से बिछड़ने की वो अँधेरी शाम मुझे तू ख़ामोश खड़ा था लेकिन बातें करता था काजल मैं तो एक नई दुनिया की धुन में भटकता फिरता हूँ मेरी तुझ से कैसे निभेगी एक हैं तेरे फ़िक्र ओ अमल मेरा मुँह क्या देख रहा है देख इस काली रात को देख मैं वही तेरा हमराही हूँ साथ मिरे चलना हो तो चल
Nasir Kazmi
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