niyyat-e-shauq bhar na jaae kahin tu bhi dil se utar na jaae kahin aaj dekha hai tujh ko der ke baad aaj ka din guzar na jaae kahin na mila kar udaas logon se husn tera bikhar na jaae kahin aarzu hai ki tu yahan aae aur phir umr bhar na jaae kahin ji jalata huun aur sochta huun raegan ye hunar na jaae kahin aao kuchh der ro hi len 'nasir' phir ye dariya utar na jaae kahin niyyat-e-shauq bhar na jae kahin tu bhi dil se utar na jae kahin aaj dekha hai tujh ko der ke baad aaj ka din guzar na jae kahin na mila kar udas logon se husn tera bikhar na jae kahin aarzu hai ki tu yahan aae aur phir umr bhar na jae kahin ji jalata hun aur sochta hun raegan ye hunar na jae kahin aao kuchh der ro hi len 'nasir' phir ye dariya utar na jae kahin
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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मुसलसल बेकली दिल को रही है मगर जीने की सूरत तो रही है मैं क्यूँँ फिरता हूँ तन्हा मारा मारा ये बस्ती चैन से क्यूँँ सो रही है चले दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर ये नगरी आज ख़ाली हो रही है न समझो तुम इसे शोर-ए-बहाराँ ख़िज़ाँ पत्तों में छुप कर रो रही है हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर' उदासी बाल खोले सो रही है
Nasir Kazmi
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शहर सुनसान है किधर जाएँ ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ रात कितनी गुज़र गई लेकिन इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ यूँँ तेरे ध्यान से लरज़ता हूँ जैसे पत्ते हवा से डर जाएँ उन उजालों की धुन में फिरता हूँ छब दिखाते ही जो गुज़र जाएँ रैन अँधेरी है और किनारा दूर चाँद निकले तो पार उतर जाएँ
Nasir Kazmi
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दिल में और तो क्या रक्खा है तेरा दर्द छुपा रक्खा है इतने दुखों की तेज़ हवा में दिल का दीप जला रक्खा है धूप से चेहरों ने दुनिया में क्या अंधेर मचा रक्खा है इस नगरी के कुछ लोगों ने दुख का नाम दवा रक्खा है वादा-ए-यार की बात न छेड़ो ये धोका भी खा रक्खा है भूल भी जाओ बीती बातें इन बातों में क्या रक्खा है चुप चुप क्यूँँ रहते हो 'नासिर' ये क्या रोग लगा रक्खा है
Nasir Kazmi
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मैं ने जब लिखना सीखा था पहले तेरा नाम लिखा था मैं वो सब्र-ए-समीम हूँ जिस ने बार-ए-अमानत सर पे लिया था मैं वो इस्म-ए-अज़ीम हूँ जिस को जिन्न-ओ-मलक ने सज्दा किया था तू ने क्यूँँ मिरा हाथ न पकड़ा मैं जब रस्ते से भटका था जो पाया है वो तेरा है जो खोया वो भी तेरा था तुझ बिन सारी उम्र गुज़ारी लोग कहेंगे तू मेरा था पहली बारिश भेजने वाले मैं तिरे दर्शन का प्यासा था
Nasir Kazmi
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जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी जब हर इक साँस सदा होती है दिल का ये हाल हुआ तेरे बा'द जैसे वीरान सरा होती है रोना आता है हमें भी लेकिन इस में तौहीन-ए-वफ़ा होती है मुँह-अँधेरे कभी उठ कर देखो क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ किस क़दर तेज़ हवा होती है ग़म के बे-नूर गुज़रगाहों में इक किरन ज़ौक़-फ़ज़ा होती है ग़म-गुसार-ए-सफ़र-ए-राह-ए-वफ़ा मिज़ा-ए-आबला-पा होती है गुलशन-ए-फ़िक्र की मुँह-बंद कली शब-ए-महताब में वा होती है जब निकलती है निगार-ए-शब-ए-गुल मुँह पे शबनम की रिदा होती है हादसा है कि ख़िज़ाँ से पहले बू-ए-गुल गुल से जुदा होती है इक नया दौर जनम लेता है एक तहज़ीब फ़ना होती है जब कोई ग़म नहीं होता 'नासिर' बेकली दिल की सिवा होती है
Nasir Kazmi
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