पल में जहाँ को देखते मेरे डुबो चुका इक वक़्त में ये दीदा भी तूफ़ान रो चुका अफ़्सोस मेरे मुर्दे पर इतना न कर कि अब पछताना यूँँ ही सा है जो होना था हो चुका लगती नहीं पलक से पलक इंतिज़ार में आँखें अगर यही हैं तो भर नींद सो चुका यक चश्मक-ए-प्याला है साक़ी बहार-ए-उम्र झपकी लगी कि दूर ये आख़िर ही हो चुका मुमकिन नहीं कि गुल करे वैसी शगुफ़्तगी उस सर ज़मीं में तुख़्म-ए-मोहब्बत मैं बो चुका पाया न दिल बहाएा हुआ सैल-ए-अश्क का मैं पंजा-ए-मिज़ा से समुंदर बिलो चुका हर सुब्ह हादसे से ये कहता है आसमाँ दे जाम-ए-ख़ून 'मीर' को गर मुँह वो धो चुका
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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क्या मिरे आने पे तू ऐ बुत-ए-मग़रूर गया कभी उस राह से निकला तो तुझे घूर गया ले गया सुब्ह के नज़दीक मुझे ख़्वाब ऐ वाए आँख उस वक़्त खुली क़ाफ़िला जब दूर गया गोर से नाले नहीं उठते तो नय उगती है जी गया पर न हमारा सर पुर-शोर गया चश्म-ए-ख़ूँ-बस्ता से कल रात लहू फिर टपका हम ने जाना था कि बस अब तो ये नासूर गया ना-तवाँ हम हैं कि हैं ख़ाक गली की उस की अब तो बे-ताक़ती से दिल का भी मक़्दूर गया ले कहीं मुँह पे नक़ाब अपने कि ऐ ग़ैरत-ए-सुब्ह शम्अ''' के चहरा-ए-रख्शां से तो अब नूर गया नाला-ए-मीर नहीं रात से सुनते हम लोग क्या तिरे कूचे से ऐ शोख़ वो रंजूर गया
Meer Taqi Meer
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हाल-ए-दिल 'मीर' का रो रो के सब ऐ माह सुना शब को अल-क़िस्सा अजब क़िस्सा-ए-जाँ-काह सुना ना-बलद हो के रह-ए-इश्क़ में पहुँचूँ तो कहीं हमरा ख़िज़र को याँ कहते हैं गुमराह सुना कोई इन तौरों से गुज़रे है तिरे ग़म में मिरी गाह तू ने न सुना हाल मिरा गाह सुना ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में हैं याँ सब तो अबस जागा 'मीर' बे-ख़बर देखा उन्हें मैं जिन्हें आगाह सुना
Meer Taqi Meer
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क्या कहें अपनी उस की शब की बात कहिए होवे जो कुछ भी ढब की बात अब तो चुप लग गई है हैरत से फिर खुलेगी ज़बान जब की बात नुक्ता-दानान-ए-रफ़्ता की न कहो बात वो है जो होवे अब की बात किस का रू-ए-सुख़न नहीं है उधर है नज़र में हमारी सब की बात ज़ुल्म है क़हर है क़यामत है ग़ुस्से में उस के ज़ेर-ए-लब की बात कहते हैं आगे था बुतों में रहम है ख़ुदा जानिए ये कब की बात गो कि आतिश-ज़बाँ थे आगे 'मीर' अब की कहिए गई वो तब की बात
Meer Taqi Meer
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मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में कपड़े उतारे उन ने सर खींचे हम कफ़न में गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें लाई बहार हम को ज़ोर-आवरी चमन में अब लाल-ए-नौ-ख़त उस के कम बख़्शते हैं फ़रहत क़ुव्वत कहाँ रहे है याक़ूती-ए-कुहन में यूसुफ़ अज़ीज़-ए-दिला जा मिस्र में हुआ था पाकीज़ा गौहरों की इज़्ज़त नहीं वतन में दैर ओ हरम से तू तो टुक गर्म-ए-नाज़ निकला हंगामा हो रहा है अब शैख़ ओ बरहमन में आ जाते शहर में तू जैसे कि आँधी आई क्या वहशतें किया हैं हम ने दिवानपन में हैं घाव दिल पर अपने तेग़-ए-ज़बाँ से सब की तब दर्द है हमारे ऐ 'मीर' हर सुख़न में
Meer Taqi Meer
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बंद-ए-क़बा को ख़ूबाँ जिस वक़्त वा करेंगे ख़म्याज़ा-कश जो होंगे मिलने के क्या करेंगे रोना यही है मुझ को तेरी जफ़ा से हर-दम ये दिल-दिमाग़ दोनों कब तक वफ़ा करेंगे है दीन सर का देना गर्दन पे अपनी ख़ूबाँ जीते हैं तो तुम्हारा ये क़र्ज़ अदा करेंगे दरवेश हैं हम आख़िर दो-इक निगह की रुख़्सत गोशे में बैठे प्यारे तुम को दुआ करेंगे आख़िर तो रोज़े आए दो-चार रोज़ हम भी तरसा बचों में जा कर दारू पिया करेंगे कुछ तो कहेगा हम को ख़ामोश देख कर वो इस बात के लिए अब चुप ही रहा करेंगे आलम मिरे है तुझ पर आई अगर क़यामत तेरी गली के हर-सू महशर हुआ करेंगे दामान-ए-दश्त सूखा अब्रों की बे-तही से जंगल में रोने को अब हम भी चला करेंगे लाई तिरी गली तक आवारगी हमारी ज़िल्लत की अपनी अब हम इज़्ज़त किया करेंगे अहवाल-'मीर' क्यूँँकर आख़िर हो एक शब में इक उम्र हम ये क़िस्सा तुम से कहा करेंगे
Meer Taqi Meer
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