ghazalKuch Alfaaz

सँभालने से तबीअत कहाँ सँभलती है वो बे-कसी है कि दुनिया रगों में चलती है ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है वो चाल हो कि बदन हो कमान जैसी कशिश क़दम से घात अदास अदा निकलती है तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है अजब इंसाफ़ इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है बिखर गए मुझे साँचे में ढालने वाले यहाँ तो ज़ात भी साँचे समेत ढलती है ख़िज़ाँ है हासिल-ए-हंगामा-ए-बहार 'ख़िज़ाँ' बहार फूलती है काएनात फलती है

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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पलकों पर हसरत की घटाएँ हम भी पागल तुम भी जी न सकें और मरते जाएँ हम भी पागल तुम भी दोनों अपनी आन के सच्चे दोनों अक़्ल के अंधे हाथ बढ़ाएँ फिर हट जाएँ हम भी पागल तुम भी ख़्वाब में जैसे जान छुड़ा कर भाग न सकने वाले भागें और वहीं रह जाएँ हम भी पागल तुम भी संदल फूले जंगल जागे नाग फिरीं मतवाले नंगे पाँव चलें घबराएँ हम भी पागल तुम भी

Mahboob Khizan

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सबब तलाश न कर बस यूँँही है ये दुनिया वही बहुत है जो कुछ जानती है ये दुनिया खुलत में बंद हैं कोंपल के सोते जागते रंग परत परत में नई दिलकशी है ये दुनिया उलझते रहने में कुछ भी नहीं थकन के सिवा बहुत हक़ीर हैं हम तुम बड़ी है ये दुनिया ये लोग साँस भी लेते हैं ज़िंदा भी हैं मगर हर आन जैसे इन्हें रोकती है ये दुनिया बहुत दिनों तो ये शर्मिंदगी थी शामिल-ए-हाल हमीं ख़राब हैं अच्छी भली है ये दुनिया हरे-भरे रहें तेरे चमन तिरे गुलज़ार हरा है ज़ख़्म-ए-तमन्ना भरी है ये दुनिया तुम अपनी लहर में हो और किसी भँवर की तरह मैं दूसरा हूँ कोई तीसरी है ये दुनिया वो अपने साथ भी रहते हैं चुप भी रहते हैं जिन्हें ख़बर है कि क्या बेचती है ये दुनिया 'ख़िज़ाँ' न सोच कि बिकती है क्यूँँ बदन की बहार समझ कि रूह की सौदा-गरी है ये दुनिया

Mahboob Khizan

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ये जो हम कभी कभी सोचते हैं रात को रात क्या समझ सके इन मुआमलात को हुस्न और नजात में फ़स्ल-ए-मश्रिक़ैन है कौन चाहता नहीं हुस्न को नजात को ये सुकून-ए-बे-जिहत ये कशिश अजीब है तुझ में बंद कर दिया किस ने शश-जहात को साहिल-ए-ख़याल पर कहकशाँ की छूट थी एक मौज ले गई इन तजल्लियात को आँख जब उठे भर आए शे'र अब कहा न जाए कैसे भूल जाए वो भूलने की बात को देख ऐ मिरी निगाह तू भी है जहाँ भी है किस ने बा-ख़बर किया दूसरे की ज़ात को क्या ऐ मिरी निगाह तू भी है जहाँ भी है किस ने बा-ख़बर कहा दूसरे की ज़ात को क्या हुईं रिवायतें अब हैं क्यूँँ शिकायतें इशक़-ए-ना-मुराद से हुस्न-ए-बे-सबात को ऐ बहार-ए-सर-गिराँ तू ख़िज़ाँ-नसीब है और हम तरस गए तेरे इल्तिफ़ात को

Mahboob Khizan

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नाज़-ओ-अंदाज़ दिल दिखाने लगे अब वो फ़ित्ने समझ में आने लगे फिर वही इंतिज़ार की ज़ंजीर रात आई दिए जलाने लगे छाँव पड़ने लगी सितारों की रूह के ज़ख़्म झिलमिलाने लगे हाल अहवाल क्या बताएँ किसे सब इरादे गए ठिकाने लगे मंज़िल-ए-सुब्ह आ गई शायद रास्ते हर तरफ़ को जाने लगे

Mahboob Khizan

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मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता ख़ुलूस-ए-नाज़ की तौहीन भी देखी नहीं जाती शुऊर-ए-हुस्न को बेदार भी करते नहीं बनता तुझे अब क्या कहें ऐ मेहरबाँ अपना ही रोना है कि सारी ज़िंदगी ईसार भी करते नहीं बनता सितम देखो कि उस बे-दर्द से अपनी लड़ाई है जिसे शर्मिंदा-ए-पैकार भी करते नहीं बनता अदा रंजीदगी परवानगी आँसू-भरी आँखें अब इतनी सादगी क्या प्यार भी करते नहीं बनता जवानी मेहरबानी हुस्न भी अच्छी मुसीबत है उसे अच्छा उसे बीमार भी करते नहीं बनता भँवर से जी भी घबराता है लेकिन क्या किया जाए तवाफ़-ए-मौज-ए-कम-रफ़्तार भी करते नहीं बनता इसी दिल को भरी दुनिया के झगड़े झेलने ठहरे यही दिल जिस को दुनिया-दार भी करते नहीं बनता जलाती है दिलों को सर्द-मेहरी भी ज़माने की सवाल-ए-गर्मी-ए-बाज़ार भी करते नहीं बनता 'ख़िज़ाँ' उन की तवज्जोह ऐसी ना-मुम्किन नहीं लेकिन ज़रा सी बात पर इसरार भी करते नहीं बनता

Mahboob Khizan

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