पलकों पर हसरत की घटाएँ हम भी पागल तुम भी जी न सकें और मरते जाएँ हम भी पागल तुम भी दोनों अपनी आन के सच्चे दोनों अक़्ल के अंधे हाथ बढ़ाएँ फिर हट जाएँ हम भी पागल तुम भी ख़्वाब में जैसे जान छुड़ा कर भाग न सकने वाले भागें और वहीं रह जाएँ हम भी पागल तुम भी संदल फूले जंगल जागे नाग फिरीं मतवाले नंगे पाँव चलें घबराएँ हम भी पागल तुम भी
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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सँभालने से तबीअत कहाँ सँभलती है वो बे-कसी है कि दुनिया रगों में चलती है ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है वो चाल हो कि बदन हो कमान जैसी कशिश क़दम से घात अदास अदा निकलती है तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है अजब इंसाफ़ इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है बिखर गए मुझे साँचे में ढालने वाले यहाँ तो ज़ात भी साँचे समेत ढलती है ख़िज़ाँ है हासिल-ए-हंगामा-ए-बहार 'ख़िज़ाँ' बहार फूलती है काएनात फलती है
Mahboob Khizan
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नाज़-ओ-अंदाज़ दिल दिखाने लगे अब वो फ़ित्ने समझ में आने लगे फिर वही इंतिज़ार की ज़ंजीर रात आई दिए जलाने लगे छाँव पड़ने लगी सितारों की रूह के ज़ख़्म झिलमिलाने लगे हाल अहवाल क्या बताएँ किसे सब इरादे गए ठिकाने लगे मंज़िल-ए-सुब्ह आ गई शायद रास्ते हर तरफ़ को जाने लगे
Mahboob Khizan
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मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता ख़ुलूस-ए-नाज़ की तौहीन भी देखी नहीं जाती शुऊर-ए-हुस्न को बेदार भी करते नहीं बनता तुझे अब क्या कहें ऐ मेहरबाँ अपना ही रोना है कि सारी ज़िंदगी ईसार भी करते नहीं बनता सितम देखो कि उस बे-दर्द से अपनी लड़ाई है जिसे शर्मिंदा-ए-पैकार भी करते नहीं बनता अदा रंजीदगी परवानगी आँसू-भरी आँखें अब इतनी सादगी क्या प्यार भी करते नहीं बनता जवानी मेहरबानी हुस्न भी अच्छी मुसीबत है उसे अच्छा उसे बीमार भी करते नहीं बनता भँवर से जी भी घबराता है लेकिन क्या किया जाए तवाफ़-ए-मौज-ए-कम-रफ़्तार भी करते नहीं बनता इसी दिल को भरी दुनिया के झगड़े झेलने ठहरे यही दिल जिस को दुनिया-दार भी करते नहीं बनता जलाती है दिलों को सर्द-मेहरी भी ज़माने की सवाल-ए-गर्मी-ए-बाज़ार भी करते नहीं बनता 'ख़िज़ाँ' उन की तवज्जोह ऐसी ना-मुम्किन नहीं लेकिन ज़रा सी बात पर इसरार भी करते नहीं बनता
Mahboob Khizan
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हम आप क़यामत से गुज़र क्यूँँ नहीं जाते जीने की शिकायत है तो मर क्यूँँ नहीं जाते कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँँ लोग सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँँ नहीं जाते आँखों में नमक है तो नज़र क्यूँँ नहीं आता पलकों पे गुहर हैं तो बिखर क्यूँँ नहीं जाते अख़बार में रोज़ाना वही शोर है या'नी अपने से ये हालात सँवर क्यूँँ नहीं जाते ये बात अभी मुझ को भी मालूम नहीं है पत्थर इधर आते हैं उधर क्यूँँ नहीं जाते तेरी ही तरह अब ये तिरे हिज्र के दिन भी जाते नज़र आते हैं मगर क्यूँँ नहीं जाते अब याद कभी आए तो आईने से पूछो 'महबूब-ख़िज़ाँ' शाम को घर क्यूँँ नहीं जाते
Mahboob Khizan
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दुख बहुत हैं ज़िंदगी में क्या करेंगे हम वो जो तेरा फ़र्ज़ था अदा करेंगे हम दिन को इतने काम किस तरह करेगा कौन रात भर तो जागते रहा करेंगे हम आधी उम्र कट गई ख़याल-ओ-ख़्वाब में शे'र सब कहेंगे और सुना करेंगे हम
Mahboob Khizan
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