ghazalKuch Alfaaz

हम आप क़यामत से गुज़र क्यूँँ नहीं जाते जीने की शिकायत है तो मर क्यूँँ नहीं जाते कतराते हैं बल खाते हैं घबराते हैं क्यूँँ लोग सर्दी है तो पानी में उतर क्यूँँ नहीं जाते आँखों में नमक है तो नज़र क्यूँँ नहीं आता पलकों पे गुहर हैं तो बिखर क्यूँँ नहीं जाते अख़बार में रोज़ाना वही शोर है या'नी अपने से ये हालात सँवर क्यूँँ नहीं जाते ये बात अभी मुझ को भी मालूम नहीं है पत्थर इधर आते हैं उधर क्यूँँ नहीं जाते तेरी ही तरह अब ये तिरे हिज्र के दिन भी जाते नज़र आते हैं मगर क्यूँँ नहीं जाते अब याद कभी आए तो आईने से पूछो 'महबूब-ख़िज़ाँ' शाम को घर क्यूँँ नहीं जाते

Related Ghazal

चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

105 likes

पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

96 likes

तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

81 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

371 likes

More from Mahboob Khizan

पलकों पर हसरत की घटाएँ हम भी पागल तुम भी जी न सकें और मरते जाएँ हम भी पागल तुम भी दोनों अपनी आन के सच्चे दोनों अक़्ल के अंधे हाथ बढ़ाएँ फिर हट जाएँ हम भी पागल तुम भी ख़्वाब में जैसे जान छुड़ा कर भाग न सकने वाले भागें और वहीं रह जाएँ हम भी पागल तुम भी संदल फूले जंगल जागे नाग फिरीं मतवाले नंगे पाँव चलें घबराएँ हम भी पागल तुम भी

Mahboob Khizan

0 likes

नाज़-ओ-अंदाज़ दिल दिखाने लगे अब वो फ़ित्ने समझ में आने लगे फिर वही इंतिज़ार की ज़ंजीर रात आई दिए जलाने लगे छाँव पड़ने लगी सितारों की रूह के ज़ख़्म झिलमिलाने लगे हाल अहवाल क्या बताएँ किसे सब इरादे गए ठिकाने लगे मंज़िल-ए-सुब्ह आ गई शायद रास्ते हर तरफ़ को जाने लगे

Mahboob Khizan

0 likes

मोहब्बत को गले का हार भी करते नहीं बनता कुछ ऐसी बात है इनकार भी करते नहीं बनता ख़ुलूस-ए-नाज़ की तौहीन भी देखी नहीं जाती शुऊर-ए-हुस्न को बेदार भी करते नहीं बनता तुझे अब क्या कहें ऐ मेहरबाँ अपना ही रोना है कि सारी ज़िंदगी ईसार भी करते नहीं बनता सितम देखो कि उस बे-दर्द से अपनी लड़ाई है जिसे शर्मिंदा-ए-पैकार भी करते नहीं बनता अदा रंजीदगी परवानगी आँसू-भरी आँखें अब इतनी सादगी क्या प्यार भी करते नहीं बनता जवानी मेहरबानी हुस्न भी अच्छी मुसीबत है उसे अच्छा उसे बीमार भी करते नहीं बनता भँवर से जी भी घबराता है लेकिन क्या किया जाए तवाफ़-ए-मौज-ए-कम-रफ़्तार भी करते नहीं बनता इसी दिल को भरी दुनिया के झगड़े झेलने ठहरे यही दिल जिस को दुनिया-दार भी करते नहीं बनता जलाती है दिलों को सर्द-मेहरी भी ज़माने की सवाल-ए-गर्मी-ए-बाज़ार भी करते नहीं बनता 'ख़िज़ाँ' उन की तवज्जोह ऐसी ना-मुम्किन नहीं लेकिन ज़रा सी बात पर इसरार भी करते नहीं बनता

Mahboob Khizan

0 likes

सबब तलाश न कर बस यूँँही है ये दुनिया वही बहुत है जो कुछ जानती है ये दुनिया खुलत में बंद हैं कोंपल के सोते जागते रंग परत परत में नई दिलकशी है ये दुनिया उलझते रहने में कुछ भी नहीं थकन के सिवा बहुत हक़ीर हैं हम तुम बड़ी है ये दुनिया ये लोग साँस भी लेते हैं ज़िंदा भी हैं मगर हर आन जैसे इन्हें रोकती है ये दुनिया बहुत दिनों तो ये शर्मिंदगी थी शामिल-ए-हाल हमीं ख़राब हैं अच्छी भली है ये दुनिया हरे-भरे रहें तेरे चमन तिरे गुलज़ार हरा है ज़ख़्म-ए-तमन्ना भरी है ये दुनिया तुम अपनी लहर में हो और किसी भँवर की तरह मैं दूसरा हूँ कोई तीसरी है ये दुनिया वो अपने साथ भी रहते हैं चुप भी रहते हैं जिन्हें ख़बर है कि क्या बेचती है ये दुनिया 'ख़िज़ाँ' न सोच कि बिकती है क्यूँँ बदन की बहार समझ कि रूह की सौदा-गरी है ये दुनिया

Mahboob Khizan

0 likes

सँभालने से तबीअत कहाँ सँभलती है वो बे-कसी है कि दुनिया रगों में चलती है ये सर्द-मेहर उजाला ये जीती-जागती रात तिरे ख़याल से तस्वीर-ए-माह जलती है वो चाल हो कि बदन हो कमान जैसी कशिश क़दम से घात अदास अदा निकलती है तुम्हें ख़याल नहीं किस तरह बताएँ तुम्हें कि साँस चलती है लेकिन उदास चलती है तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है अजब इंसाफ़ इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है बिखर गए मुझे साँचे में ढालने वाले यहाँ तो ज़ात भी साँचे समेत ढलती है ख़िज़ाँ है हासिल-ए-हंगामा-ए-बहार 'ख़िज़ाँ' बहार फूलती है काएनात फलती है

Mahboob Khizan

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Mahboob Khizan.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Mahboob Khizan's ghazal.