ghazalKuch Alfaaz

हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori102 Likes

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना

Zubair Ali Tabish

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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यूँँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं जैसे का'बे की खुली छत पे बिलाल आते हैं रोज़ हम अश्कों से धो आते हैं दीवार-ए-हरम पगड़ियाँ रोज़ फ़रिश्तों की उछाल आते हैं हाथ अभी पीछे बंधे रहते हैं चुप रहते हैं देखना ये है तुझे कितने कमाल आते हैं चाँद सूरज मिरी चौखट पे कई सदियों से रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं बे-हिसी मुर्दा-दिली रक़्स शराबें नग़्में बस इसी राह से क़ौमों पे ज़वाल आते हैं

Rahat Indori

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चेहरों की धूप आँखों की गहराई ले गया आईना सारे शहर की बीनाई ले गया डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सिरा करें ये हादिसा तो सोच की गहराई ले गया हालाँकि बे-ज़बान था लेकिन अजीब था जो शख़्स मुझ से छीन के गोयाई ले गया मैं आज अपने घर से निकलने न पाऊँगा बस इक क़मीस थी जो मिरा भाई ले गया 'ग़ालिब' तुम्हारे वास्ते अब कुछ नहीं रहा गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया

Rahat Indori

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साथ मंज़िल थी मगर ख़ौफ़-ओ-ख़तर ऐसा था उम्र-भर चलते रहे लोग सफ़र ऐसा था जब वो आए तो मैं ख़ुश भी हुआ शर्मिंदा भी मेरी तक़दीर थी ऐसी मिरा घर ऐसा था हिफ़्ज़ थीं मुझ को भी चेहरों की किताबें क्या क्या दिल शिकस्ता था मगर तेज़ नज़र ऐसा था आग ओढ़े था मगर बाँट रहा था साया धूप के शहर में इक तन्हा शजर ऐसा था लोग ख़ुद अपने चराग़ों को बुझा कर सोए शहर में तेज़ हवाओं का असर ऐसा था

Rahat Indori

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शाम ने जब पलकों पे आतिश-दान लिया कुछ यादों ने चुटकी में लोबान लिया दरवाज़ों ने अपनी आँखें नम कर लीं दीवारों ने अपना सीना तान लिया प्यास तो अपनी सात समुंदर जैसी थी नाहक़ हम ने बारिश का एहसान लिया मैं ने तलवों से बाँधी थी छाँव मगर शायद मुझ को सूरज ने पहचान लिया कितने सुख से धरती ओढ़ के सोए हैं हम ने अपनी माँ का कहना मान लिया

Rahat Indori

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जब कभी फूलों ने ख़ुश्बू की तिजारत की है पत्ती पत्ती ने हवाओं से शिकायत की है यूँँ लगा जैसे कोई इत्र फ़ज़ा में घुल जाए जब किसी बच्चे ने क़ुरआँ की तिलावत की है जा-नमाज़ों की तरह नूर में उज्लाई सहर रात भर जैसे फ़रिश्तों ने इबादत की है सर उठाए थीं बहुत सुर्ख़ हवा में फिर भी हम ने पलकों के चराग़ों की हिफ़ाज़त की है मुझे तूफ़ान-ए-हवादिस से डराने वालो हादसों ने तो मिरे हाथ पे बैअ'त की है आज इक दाना-ए-गंदुम के भी हक़दार नहीं हम ने सदियों इन्हीं खेतों पे हुकूमत की है ये ज़रूरी था कि हम देखते क़िलओं' के जलाल उम्र भर हम ने मज़ारों की ज़ियारत की है

Rahat Indori

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