साथ मंज़िल थी मगर ख़ौफ़-ओ-ख़तर ऐसा था उम्र-भर चलते रहे लोग सफ़र ऐसा था जब वो आए तो मैं ख़ुश भी हुआ शर्मिंदा भी मेरी तक़दीर थी ऐसी मिरा घर ऐसा था हिफ़्ज़ थीं मुझ को भी चेहरों की किताबें क्या क्या दिल शिकस्ता था मगर तेज़ नज़र ऐसा था आग ओढ़े था मगर बाँट रहा था साया धूप के शहर में इक तन्हा शजर ऐसा था लोग ख़ुद अपने चराग़ों को बुझा कर सोए शहर में तेज़ हवाओं का असर ऐसा था
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी
Umair Najmi
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नहीं था अपना मगर फिर भी अपना अपना लगा किसी से मिल के बहुत देर बा'द अच्छा लगा तुम्हें लगा था मैं मर जाऊँगा तुम्हारे बग़ैर बताओ फिर तुम्हें मेरा मज़ाक़ कैसा लगा तिजोरियों पे नज़र और लोग रखते हैं मैं आसमान चुरा लूँगा जब भी मौक़ा लगा दिखाती है भरी अलमारियाँ बड़े दिल से बताती है कि मोहब्बत में किस का कितना लगा
Tehzeeb Hafi
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शजर हैं अब समर-आसार मेरे चले आते हैं दावेदार मेरे मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं समुंदर हैं समुंदर पार मेरे अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें अगर चाहें तो ये बीमार मेरे हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन गए बेकार सारे वार मेरे मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे हँसी में टाल देना था मुझे भी ख़ता क्यूँँ हो गए सरकार मेरे तसव्वुर में न जाने कौन आया महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे तुम्हारा नाम दुनिया जानती है बहुत रुस्वा हैं अब अश'आर मेरे भँवर में रुक गई है नाव मेरी किनारे रह गए इस पार मेरे मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे
Rahat Indori
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शाम ने जब पलकों पे आतिश-दान लिया कुछ यादों ने चुटकी में लोबान लिया दरवाज़ों ने अपनी आँखें नम कर लीं दीवारों ने अपना सीना तान लिया प्यास तो अपनी सात समुंदर जैसी थी नाहक़ हम ने बारिश का एहसान लिया मैं ने तलवों से बाँधी थी छाँव मगर शायद मुझ को सूरज ने पहचान लिया कितने सुख से धरती ओढ़ के सोए हैं हम ने अपनी माँ का कहना मान लिया
Rahat Indori
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उठी निगाह तो अपने ही रू-ब-रू हम थे ज़मीन आईना-ख़ाना थी चार-सू हम थे दिनों के बा'द अचानक तुम्हारा ध्यान आया ख़ुदा का शुक्र कि उस वक़्त बा-वज़ू हम थे वो आईना तो नहीं था पर आईने सा था वो हम नहीं थे मगर यार हू-ब-हू हम थे ज़मीं पे लड़ते हुए आसमाँ के नर्ग़े में कभी कभी कोई दुश्मन कभू कभू हम थे हमारा ज़िक्र भी अब जुर्म हो गया है वहाँ दिनों की बात है महफ़िल की आबरू हम थे ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे
Rahat Indori
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दिए बुझे हैं मगर दूर तक उजाला है ये आप आए हैं या दिन निकलने वाला है ख़याल में भी तेरा अक़्स देखने के बा'द जो शख़्स होश गँवा दे वो दोश वाला है जवाब देने के अन्दाज़ भी निराले हैं सलाम करने का अन्दाज़ भी निराला है सुनहरी धूप है सदक़ा तेरे तबस्सुम का ये चाँदनी तेरी परछाईं का उजाला है है तेरे पैरों की आहट ज़मीन की गर्दिश ये आ समाँ तेरी अँगड़ाई का हवाला है
Rahat Indori
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हम ने ख़ुद अपनी रहनुमाई की और शोहरत हुई ख़ुदाई की मैं ने दुनिया से मुझ से दुनिया ने सैकड़ों बार बे-वफ़ाई की खुले रहते हैं सारे दरवाज़े कोई सूरत नहीं रिहाई की टूट कर हम मिले हैं पहली बार ये शुरूआ'त है जुदाई की सोए रहते हैं ओढ़ कर ख़ुद को अब ज़रूरत नहीं रज़ाई की मंज़िलें चूमती हैं मेरे क़दम दाद दीजे शिकस्ता-पाई की ज़िंदगी जैसे-तैसे काटनी है क्या भलाई की क्या बुराई की इश्क़ के कारोबार में हम ने जान दे कर बड़ी कमाई की अब किसी की ज़बाँ नहीं खुलती रस्म जारी है मुँह-भराई की
Rahat Indori
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