ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना
Related Ghazal
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
73 likes
पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
96 likes
More from Zubair Ali Tabish
चाँद को दामन में ला कर रख दिया उस ने मेरी गोद में सर रख दिया आँख में आँसू है किस के नाम के किस ने कश्ती में समुंदर रख दिया वो बताने लग गया मजबूरियाँ और फिर हम ने रिसीवर रख दिया
Zubair Ali Tabish
31 likes
बैठे-बैठे इक दम से चौंकाती है याद तिरी कब दस्तक दे कर आती है तितली के जैसी है मेरी हर ख़्वाहिश हाथ लगाने से पहले उड़ जाती है मेरे सज्दे राज़ नहीं रहने वाले उस की चौखट माथे को चमकाती है इश्क़ में जितना बहको उतना ही अच्छा ये गुमराही मंज़िल तक पहुँचाती है पहली पहली बार अजब सा लगता है धीरे धीरे आदत सी हो जाती है तुम उस को भी समझा कर पछताओगे वो भी मेरे ही जैसी जज़्बाती है
Zubair Ali Tabish
27 likes
दिल फिर उस कूचे में जाने वाला है बैठे-बिठाए ठोकर खाने वाला है तर्क-ए-त'अल्लुक़ का धड़का सा है दिल को वो मुझ को इक बात बताने वाला है कितने अदब से बैठे हैं सूखे पौदे जैसे बादल शे'र सुनाने वाला है ये मत सोच सराए पर क्या बीतेगी तू तो बस इक रात बिताने वाला है ईंटों को आपस में मिलाने वाला शख़्स अस्ल में इक दीवार उठाने वाला है गाड़ी की रफ़्तार में आई है सुस्ती शायद अब स्टेशन आने वाला है आख़िरी हिचकी लेनी है अब आ जाओ बा'द में तुम को कौन बुलाने वाला है
Zubair Ali Tabish
33 likes
पहले मुफ़्त में प्यास बटेगी बा'द में इक-इक बूँद बिकेगी कितने हसीं हो माशा-अल्लाह तुम पे मोहब्बत ख़ूब जचेगी ज़ालिम बस इतना बतला दे क्या रोने की छूट मिलेगी आज तो पत्थर बाँध लिया है लेकिन कल फिर भूक लगेगी मैं भी पागल तू भी पागल हम दोनों की ख़ूब जमेगी यार ने पानी फेर दिया है ख़ाक हमारी ख़ाक उड़ेगी दुनिया को ऐसे भूलूँगा दुनिया मुझ को याद करेगी
Zubair Ali Tabish
30 likes
भरे हुए जाम पर सुराही का सर झुका तो बुरा लगेगा जिसे तेरी आरज़ू नहीं तू उसे मिला तो बुरा लगेगा ये ऐसा रस्ता है जिस पे हर कोई बारहा लड़खड़ा रहा है मैं पहली ठोकर के बा'द ही गर सँभल गया तो बुरा लगेगा मैं ख़ुश हूँ उस के निकालने पर और इतना आगे निकल चुका हूँ के अब अचानक से उस ने वापस बुला लिया तो बुरा लगेगा ये आख़िरी कंपकंपाता जुमला कि इस तअ'ल्लुक़ को ख़त्म कर दो बड़े जतन से कहा है उस ने नहीं किया तो बुरा लगेगा न जाने कितने ग़मों को पीने के बा'द ताबिश चढ़ी उदासी किसी ने ऐसे में आ के हम को हँसा दिया तो बुरा लगेगा
Zubair Ali Tabish
28 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Zubair Ali Tabish.
Similar Moods
More moods that pair well with Zubair Ali Tabish's ghazal.







