ghazalKuch Alfaaz

पहले मुफ़्त में प्यास बटेगी बा'द में इक-इक बूँद बिकेगी कितने हसीं हो माशा-अल्लाह तुम पे मोहब्बत ख़ूब जचेगी ज़ालिम बस इतना बतला दे क्या रोने की छूट मिलेगी आज तो पत्थर बाँध लिया है लेकिन कल फिर भूक लगेगी मैं भी पागल तू भी पागल हम दोनों की ख़ूब जमेगी यार ने पानी फेर दिया है ख़ाक हमारी ख़ाक उड़ेगी दुनिया को ऐसे भूलूँगा दुनिया मुझ को याद करेगी

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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दिल फिर उस कूचे में जाने वाला है बैठे-बिठाए ठोकर खाने वाला है तर्क-ए-त'अल्लुक़ का धड़का सा है दिल को वो मुझ को इक बात बताने वाला है कितने अदब से बैठे हैं सूखे पौदे जैसे बादल शे'र सुनाने वाला है ये मत सोच सराए पर क्या बीतेगी तू तो बस इक रात बिताने वाला है ईंटों को आपस में मिलाने वाला शख़्स अस्ल में इक दीवार उठाने वाला है गाड़ी की रफ़्तार में आई है सुस्ती शायद अब स्टेशन आने वाला है आख़िरी हिचकी लेनी है अब आ जाओ बा'द में तुम को कौन बुलाने वाला है

Zubair Ali Tabish

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चाँद को दामन में ला कर रख दिया उस ने मेरी गोद में सर रख दिया आँख में आँसू है किस के नाम के किस ने कश्ती में समुंदर रख दिया वो बताने लग गया मजबूरियाँ और फिर हम ने रिसीवर रख दिया

Zubair Ali Tabish

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बस इक निगाह-ए-नाज़ को तरसा हुआ था मैं हालांकि शहर-शहर में फैला हुआ था मैं मुद्दत के बा'द आइना देखा तो रो पड़ा किस बेहतरीन दोस्त से रूठा हुआ था मैं पहना जो रेनकोट तो बारिश नहीं हुई लौटा जो घर तो शर्म से भीगा हुआ था मैं पहले भी दी गई थी मुझे बज़्म की दुआ पहले भी इस दुआ पे अकेला हुआ था मैं कितनी अजीब बात है ना! तू ही आ गया! तेरे ही इंतिज़ार में बैठा हुआ था मैं

Zubair Ali Tabish

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वैसे तू मेरे मकाँ तक तो चला आता है फिर अचानक से तिरे ज़ेहन में क्या आता है आहें भरता हूँ कि पूछे कोई आहों का सबब फिर तिरा ज़िक्र निकलता है मज़ा आता है तेरे ख़त आज लतीफ़ों की तरह लगते हैं ख़ूब हँसता हूँ जहाँ लफ़्ज़-ए-वफ़ा आता है जाते-जाते ये कहा उस ने चलो आता हूँ अब यही देखना है जाता है या आता है तुझ को वैसे तो ज़माने के हुनर आते हैं प्यार आता है कभी तुझ को बता आता है

Zubair Ali Tabish

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तुम्हारे ग़म से तौबा कर रहा हूँ तअ'ज्जुब है मैं ऐसा कर रहा हूँ है अपने हाथ में अपना गिरेबाँ न जाने किस से झगड़ा कर रहा हूँ बहुत से बंद ताले खुल रहे हैं तिरे सब ख़त इकट्ठा कर रहा हूँ कोई तितली निशाने पर नहीं है मैं बस रंगों का पीछा कर रहा हूँ मैं रस्मन कह रहा हूँ फिर मिलेंगे ये मत समझो कि वा'दा कर रहा हूँ मिरे अहबाब सारे शहर में हैं मैं अपने गाँव में क्या कर रहा हूँ मिरी हर इक ग़ज़ल असली है साहब कई बरसों से धंदा कर रहा हूँ

Zubair Ali Tabish

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