सुकूत-ए-शाम का हिस्सा तू मत बना मुझ को मैं रंग हूँ सो किसी मौज में मिला मुझ को मैं इन दिनों तिरी आँखों के इख़्तियार में हूँ जमाल-ए-सब्ज़ किसी तजरबे में ला मुझ को मैं बूढे जिस्म की ज़िल्लत उठा नहीं सकता किसी क़दीम तजल्ली से कर नया मुझ को मैं अपने होने की तकमील चाहता हूँ सखी सो अब बदन की हिरासत से कर रिहा मुझ को मुझे चराग़ की हैरत भी हो चुकी मालूम अब इस से आगे कोई रास्ता बता मुझ को उस इस्म-ए-ख़ास की तरकीब से बना हूँ मैं मोहब्बतों के तलफ़्फ़ुज़ से कर नया मुझ को दरून-ए-सीना जिसे दिल समझ रहा था 'अली' वो नीली आग है ये अब पता चला मुझ को
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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चुप-चाप क्यूँ फिरो हो कोई बात तो करो हल भी निकालते हैं मुलाक़ात तो करो ख़ाली हवा में उड़ना फकीरी नहीं मियाँ दिल जोड़ के दिखाओ करामात तो करो
Ali Zaryoun
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हालत ए हिज्र में हूँ यार मेरी सम्त न देख तू न हो जाए गिरफ्तार, मेरी सम्त न देख आस्तीन में जो छूपे सांप हैं उन को तो निकाल अपने नुक़सान पर हर बार मेरी सम्त न देख तुझ को जिस बात का 'ख़द्शा' है वो हो सकती है ऐसे नश्शे में लगातार मेरी सम्त न देख या कोई बात सुना या मुझे सीने से लगा इस तरह बैठ कर बेकार मेरी सम्त न देख तेरा यारों से नहीं जेब से याराना है ऐ मोहब्बत के दुकाँदार मेरी सम्त न देख
Ali Zaryoun
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हो जिसे यार से तस्दीक़ नहीं कर सकता वो किसी शे'र की तज़हीक नहीं कर सकता पुर-कशिश दोस्त मेरे हिज्र की मजबूरी समझ मैं तुझे दूर से नज़दीक नहीं कर सकता मुझ पे तनक़ीद से रहते हैं उजाले जिन में उन दुकानों को मैं तारीक नहीं कर सकता कौन से ग़म से निकलना है किसे रखना है मसअला ये है मैं तफरीक नहीं कर सकता पेड़ को गालियां बकने के इलावा ज़रयून क्या करें वो के जो तख़्लीक़ नहीं कर सकता शे'र तो ख़ैर मैं तन्हाई में कह लूगा अली अपनी हालत तो मैं ख़ुद ठीक नहीं कर सकता हिज्र से गुजरे बिना इश्क़ बताने वाला बहस कर सकता है तहक़ीक़ नहीं कर सकता
Ali Zaryoun
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जागना और जगा के सो जाना रात को दिन बना के सो जाना टेक्स्ट करना तमाम रात उस को उँगलियों को दबा के सो जाना आज फिर देर से घर आया हूँ आज फिर मुँह बना के सो जाना
Ali Zaryoun
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छू कर दर-ए-शिफ़ा को शिफा हो गया हूँ मैं इस अरसा-ए-वबा में दुआ हो गया हूँ मैं इक बे-निशाँ के घर का पता हो गया हूँ मैं हर ला दवा के ग़म की दवा हो गया हूँ मैं मैं था जो अपनी आप रुकावट था साहिबा अच्छा हुआ कि ख़ुद से जुदा हो गया हूँ मैं तू ने उधर जुदाई का सोचा ही था इधर बैठे-बिठाए तुझ से रिहा हो गया हूँ मैं तुम को ख़बर नहीं है कि क्या बन गए हो तुम मुझ को तो सब पता है कि क्या हो गया हूँ मैं मैं हूँ तो लोग क्यूँ मुझे कहते हैं कि वो हो तुम गर तुम नहीं तो किस में फ़ना हो गया हूँ मैं
Ali Zaryoun
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