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sukhi tahni tanha chidiya phika chand ankhon ke sahra men ek nami ka chand us mathe ko chume kitne din biite jis mathe ki khatir tha ik tiika chand pahle tu lagti thi kitni begana kitna mubham hota hai pahli ka chand kam ho kaise in khushiyon se tera ghham lahron men kab bahta hai naddi ka chand aao ab ham is ke bhi tukde kar len dhaka ravalpindi aur dilli ka chand sukhi tahni tanha chidiya phika chand aankhon ke sahra mein ek nami ka chand us mathe ko chume kitne din bite jis mathe ki khatir tha ek tika chand pahle tu lagti thi kitni begana kitna mubham hota hai pahli ka chand kam ho kaise in khushiyon se tera gham lahron mein kab bahta hai naddi ka chand aao ab hum is ke bhi tukde kar len dhaka rawalpindi aur dilli ka chand

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इक ज़रा सा टूट कर मिस्मार हो जाता है क्या आईने का आईना बेकार हो जाता है क्या आज कल मायूस वापस आ रहे हैं क़ाफ़िले आज कल उस दर से भी इनकार हो जाता है क्या हाथ पाँव मारने से हो नहीं सकता अगर डूब जाने से समुंदर पार हो जाता है क्या आलम-ए-तन्हाई में भी उस का ऐसा ख़ौफ़ है ज़ेहन में होता है क्या इज़हार हो जाता है क्या हाए उस का इस क़दर मासूमियत से पूछना लड़कियों को लड़कियों से प्यार हो जाता है क्या

Zia Mazkoor

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एक भयानक तूफ़ाँ आया पूरा छप्पर उड़ा दिया लेकिन फिर मेरी हिम्मत ने सारा मंज़र उड़ा दिया जितना पैसा लाई थी वो हफ़्तों तक बर्तन धोके उस के शौहर ने इक दिन में दारू पी कर उड़ा दिया हार गए जब दुनिया के सब वीर बहादुर और राजा इक लड़के ने धनुष उठाया और स्वयंवर उड़ा दिया हैरानी से दंग हुए तब जादू देख रहे सब लोग एक कबूतर ने ग़ुस्से में जब जादूगर उड़ा दिया डूब चुके थे उस की आँखों में हम इतने, मत पूछो क्या बतलाएँ चिड़िया उड़ में हम ने बन्दर उड़ा दिया

Tanoj Dadhich

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हालत जो हमारी है तुम्हारी तो नहीं है ऐसा है तो फिर ये कोई यारी तो नहीं है तहक़ीर ना कर ये मेरी उधड़ी हुई गुदड़ी जैसी भी है अपनी है उधारी तो नहीं है तन्हा ही सही लड़ तो रही है वो अकेली बस थक के गिरी है अभी हारी तो नहीं है ये तू जो मोहब्बत में सिला माँग रहा है ऐ शख़्स तू अंदर से भिखारी तो नहीं है जितनी भी कमा ली हो बना ली हो ये दुनिया दुनिया है तो फिर दोस्त तुम्हारी तो नहीं है

Ali Zaryoun

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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वक़्त ही कम था फ़ैसले के लिए वर्ना मैं आता मशवरे के लिए तुम को अच्छे लगे तो तुम रख लो फूल तोड़े थे बेचने के लिए घंटों ख़ामोश रहना पड़ता है आप के साथ बोलने के लिए सैकड़ों कुंडियाँ लगा रहा हूँ चंद बटनों को खोलने के लिए एक दीवार बाग़ से पहले इक दुपट्टा खुले गले के लिए तर्क अपनी फ़लाह कर दी है और क्या हो मुआशरे के लिए लोग आयात पढ़ के सोते हैं आप के ख़्वाब देखने के लिए अब मैं रस्ते में लेट जाऊँ क्या जाने वालों को रोकने के लिए

Zia Mazkoor

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More from Javed Akhtar

हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है मगर वो बात पहले सी नहीं है मुझे मायूस भी करती नहीं है यही आदत तिरी अच्छी नहीं है बहुत से फ़ाएदे हैं मस्लहत में मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है हर इक की दास्ताँ सुनते हैं जैसे कभी हम ने मोहब्बत की नहीं है है इक दरवाज़े बिन दीवार-ए-दुनिया मफ़र ग़म से यहाँ कोई नहीं है

Javed Akhtar

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जिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू भिक्षु-दानी, प्यासा पानी, दरिया सागर, जल गागर गुलशन ख़ुशबू, कोयल कूकू, मस्ती दारू, मैं और तू बाँबी नागिन, छाया आँगन, घुँघरू छन-छन, आशा मन आँखें काजल, पर्बत बादल, वो ज़ुल्फ़ें और ये बाज़ू रातें महकी, साँसें दहकी, नज़रें बहकी, रुत लहकी स्वप्न सलोना, प्रेम खिलौना, फूल बिछौना, वो पहलू तुम से दूरी, ये मजबूरी, ज़ख़्म-ए-कारी, बेदारी, तन्हा रातें, सपने क़ातें, ख़ुद से बातें, मेरी ख़ू

Javed Akhtar

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खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा ख़ुलूस तो है मगर ए'तिबार जाता रहा किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही मगर कभी जो हमें था ख़ुमार जाता रहा कभी जो सीने में इक आग थी वो सर्द हुई कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा अजब सा चैन था हम को कि जब थे हम बेचैन क़रार आया तो जैसे क़रार जाता रहा कभी तो मेरी भी सुनवाई होगी महफ़िल में मैं ये उमीद लिए बार बार जाता रहा

Javed Akhtar

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बहाना ढूँडते रहते हैं कोई रोने का हमें ये शौक़ है क्या आस्तीं भिगोने का अगर पलक पे है मोती तो ये नहीं काफ़ी हुनर भी चाहिए अल्फ़ाज़ में पिरोने का जो फ़स्ल ख़्वाब की तय्यार है तो ये जानो कि वक़्त आ गया फिर दर्द कोई बोने का ये ज़िंदगी भी अजब कारोबार है कि मुझे ख़ुशी है पाने की कोई न रंज खोने का है पाश पाश मगर फिर भी मुस्कुराता है वो चेहरा जैसे हो टूटे हुए खिलौने का

Javed Akhtar

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दिल का हर दर्द खो गया जैसे मैं तो पत्थर का हो गया जैसे दाग़ बाक़ी नहीं कि नक़्श कहूँ कोई दीवार धो गया जैसे जागता ज़ेहन ग़म की धूप में था छाँव पाते ही सो गया जैसे देखने वाला था कल उस का तपाक फिर से वो ग़ैर हो गया जैसे कुछ बिछड़ने के भी तरीक़े हैं ख़ैर जाने दो जो गया जैसे

Javed Akhtar

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