ता'रीफ़ उस ख़ुदा की जिस ने जहाँ बनाया कैसी ज़मीं बनाई क्या आ समाँ बनाया पाँव तले बिछाया क्या ख़ूब फ़र्श-ए-ख़ाकी और सर पे लाजवर्दी इक साएबां बनाया मिट्टी से बेल-बूटे क्या ख़ुशनुमा उगाए पहना के सब्ज़ ख़िलअत उन को जवां बनाया ख़ुश-रंग और ख़ुशबू गुल फूल हैं खिलाए इस ख़ाक के खंडर को क्या गुलिस्ताँ बनाया मेवे लगाए क्या क्या ख़ुश-ज़ाएक़ा रसीले चखने से जिन के मुझ को शीरीं-द हाँ बनाया सूरज बना के तू ने रौनक़ जहाँ को बख़्शी रहने को ये हमारे अच्छा मकाँ बनाया प्यासी ज़मीं के मुँह में मेंह का चुवाया पानी और बादलों को तू ने मेंह का निशां बनाया ये प्यारी प्यारी चिड़ियाँ फिरती हैं जो चहकती क़ुदरत ने तेरी उन को तस्बीह-ख़्वाँ बनाया तिनके उठा उठा कर लाईं कहाँ-कहाँ से किस ख़ूब-सूरती से फिर आशियाँ बनाया ऊंची उड़ें हवा में बच्चों को पर न भूलें इन बे-परों का उन को रोज़ी-रसाँ बनाया क्या दूध देने वाली गायें बनाईं तू ने चढ़ने को मेरे घोड़ा क्या ख़ुश-इनाँ बनाया रहमत से तेरी क्या क्या हैं नेमतें मुयस्सर इन नेमतों का मुझ को है क़द्र-दाँ बनाया आब-ए-रवाँ के अंदर मछली बनाई तू ने मछली के तैरने को आब-ए-रवाँ बनाया हर चीज़ से है तेरी कारीगरी टपकती ये कारख़ाना तू ने कब राएगां बनाया
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी
Kumar Vishwas
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वो तो अच्छा है ग़ज़ल तेरा सहारा है मुझे वर्ना फ़िक्रों ने तो बस घेर के मारा है मुझे जिस की तस्वीर मैं काग़ज़ पे बना भी न सका उस ने मेहँदी से हथेली पे उतारा है मुझे ग़ैर के हाथ से मरहम मुझे मंज़ूर नहीं तुम मगर ज़ख़्म भी दे दो तो गवारा है मुझे
Abrar Kashif
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