ghazalKuch Alfaaz

थकन तो अगले सफ़र के लिए बहाना था उसे तो यूँँ भी किसी और सम्त जाना था वही चराग़ बुझा जिस की लौ क़यामत थी उसी पे ज़र्ब पड़ी जो शजर पुराना था मता-ए-जाँ का बदल एक पल की सरशारी सुलूक ख़्वाब का आँखों से ताजिराना था हवा की काट शगूफ़ों ने जज़्ब कर ली थी तभी तो लहजा-ए-ख़ुशबू भी जारेहाना था वही फ़िराक़ की बातें वही हिकायत-ए-वस्ल नई किताब का एक इक वरक़ पुराना था क़बा-ए-ज़र्द निगार-ए-ख़िज़ाँ पे सजती थी तभी तो चाल का अंदाज़ ख़ुसरवाना था

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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किस तरह होगा फ़कीरों का गुज़ारा सोचे उस सेे कहना कि वो इक बार दुबारा सोचे कैसे मुमकिन है उसे और कोई काम न हो कैसे मुमकिन है कि वो सिर्फ़ हमारा सोचे तेरे अफ़लाक पे जाए तो सितारा चमके मेरे अफ़लाक पे आए तो सितारा सोचे टूटे पतवार की कश्ती का मुक़द्दर क्या है ये तो दरिया ही बताए या किनारा सोचे ऐसा मौका हो कि बस एक ही बच सकता हो और उस वक़्त भी एक शख़्स तुम्हारा सोचे

Zahid Bashir

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झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे ये तेरे साथ तअ'ल्लुक़ का बड़ा फ़ाइदा है आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे ऐसा माहौल जहाँ आँख लगे डर न लगे माँओं ने चूमना होते हैं बुरीदा सर भी उस से कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे ये तलबगार निगाहों के तक़ाज़े हर सू कोई तो ऐसी जगह हो जो मुझे घर न लगे ये जो आईना है देखूँ तो ख़ला दिखता है इस जगह कुछ भी न लगवाऊँ तो बेहतर न लगे तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे

Umair Najmi

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ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है यहाँ वा'दों की अर्ज़ानी बहुत है शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं मगर लहजों में वीरानी बहुत है सुबुक-ज़र्फ़ों के क़ाबू में नहीं लफ़्ज़ मगर शौक़-ए-गुल-अफ़्शानी बहुत है है बाज़ारों में पानी सर से ऊँचा मिरे घर में भी तुग़्यानी बहुत है न जाने कब मिरे सहरा में आए वो इक दरिया कि तूफ़ानी बहुत है न जाने कब मिरे आँगन में बरसे वो इक बादल कि नुक़सानी बहुत है

Iftikhar Arif

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कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में ये वक़्त किस की र'ऊनत पे ख़ाक डाल गया ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में यही है मस्लहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में

Iftikhar Arif

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मेरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो'तबर कर दे मैं जिस मकान में रहता हूँ उस को घर कर दे ये रौशनी के तआ'क़ुब में भागता हुआ दिन जो थक गया है तो अब इस को मुख़्तसर कर दे मैं ज़िंदगी की दुआ माँगने लगा हूँ बहुत जो हो सके तो दुआओं को बे-असर कर दे सितारा-ए-सहरी डूबने को आया है ज़रा कोई मिरे सूरज को बा-ख़बर कर दे क़बीला-वार कमानें कड़कने वाली हैं मेरे लहू की गवाही मुझे निडर कर दे मैं अपने ख़्वाब से कट कर जियूँ तो मेरा ख़ुदा उजाड़ दे मिरी मिट्टी को दर-ब-दर कर दे मेरी ज़मीन मेरा आख़िरी हवाला है सो मैं रहूँ न रहूँ इस को बारवर कर दे

Iftikhar Arif

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वफ़ा की ख़ैर मनाता हूँ बे-वफ़ाई में भी मैं उस की क़ैद में हूँ क़ैद से रिहाई में भी लहू की आग में जल-बुझ गए बदन तो खुला रसाई में भी ख़सारा है ना-रसाई में भी बदलते रहते हैं मौसम गुज़रता रहता है वक़्त मगर ये दिल कि वहीं का वहीं जुदाई में भी लिहाज़-ए-हुर्मत-ए-पैमाँ न पास-ए-हम-ख़्वाबी अजब तरह के तसादुम थे आशनाई में भी मैं दस बरस से किसी ख़्वाब के अज़ाब में हूँ वही अज़ाब दर आया है इस दहाई में भी तसादुम-ए-दिल-ओ-दुनिया में दिल की हार के बा'द हिजाब आने लगा है ग़ज़ल-सराई में भी मैं जा रहा हूँ अब उस की तरफ़ उसी की तरफ़ जो मेरे साथ था मेरी शिकस्ता-पाई में भी

Iftikhar Arif

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कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या शिकम की आग लिए फिर रही है शहर-ब-शहर सग-ए-ज़माना हैं हम क्या हमारी हिजरत क्या दिमश्क़-ए-मस्लहत ओ कूफ़ा-ए-निफ़ाक़ के बीच फ़ुग़ान-ए-क़ाफ़िला-ए-बे-नवा की क़ीमत क्या मआल-ए-इज़्ज़त-ए-सादात-ए-इश्क़ देख के हम बदल गए तो बदलने पे इतनी हैरत क्या क़िमार-ख़ाना-ए-हस्ती में एक बाज़ी पर तमाम उम्र लगा दी तो फिर शिकायत क्या फ़रोग़-ए-सनअत-ए-क़द-आवरी का मौसम है सुबुक हुए पे भी निकला है क़द्द-ओ-क़ामत क्या

Iftikhar Arif

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