tum koi is se tavaqqo na lagana mare dost ye zamana hai zamana hai zamana mire dost samne to ho tasavvur men kahani koi ik haqiqat se bada ek fasana mire dost mere bete main tumhen dost samajhne laga huun tum bade ho ke mujhe duniya dikhana mire dost dekh sakta bhi nahin mujh ko zarurat bhi nahin meri tasvir magar us ko dikhana mire dost kahne vaale ne kaha dekh ke chehra mera ghham-e-khazana hai ise sab se chhupana mire dost teri mahfil ke liye bais-e-barkat hoga na-muradan-e-mohabbat ko bulana mire dost tum ko maalum to hai mujh pe jo guzri 'taimur' puchh kar mujh se zaruri hai rulana mire dost tum koi is se tawaqqo na lagana mare dost ye zamana hai zamana hai zamana mere dost samne to ho tasawwur mein kahani koi ek haqiqat se bada ek fasana mere dost mere bete main tumhein dost samajhne laga hun tum bade ho ke mujhe duniya dikhana mere dost dekh sakta bhi nahin mujh ko zarurat bhi nahin meri taswir magar us ko dikhana mere dost kahne wale ne kaha dekh ke chehra mera gham-e-khazana hai ise sab se chhupana mere dost teri mahfil ke liye bais-e-barkat hoga na-muradan-e-mohabbat ko bulana mere dost tum ko malum to hai mujh pe jo guzri 'taimur' puchh kar mujh se zaruri hai rulana mere dost
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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वो कम-सुख़न न था पर बात सोच कर करता यही सलीक़ा उसे सब में मो'तबर करता न जाने कितनी ग़लत-फ़हमियाँ जनम लेतीं मैं अस्ल बात से पहलू-तही अगर करता मैं सोचता हूँ कहाँ बात इस क़दर बढ़ती अगर मैं तेरे रवय्ये से दर-गुज़र करता मिरा अदू तो था इल्म-उल-कलाम का माहिर मिरे ख़िलाफ़ ज़माने को बोल कर करता अकेले जंग लड़ी जीत ली तो सब ने कहा पहुँचते हम भी अगर तू हमें ख़बर करता मिरी भी छाँव न होती अगर तुम्हारी तरह मैं इंहिसार बुज़ुर्गों के साए पर करता सफ़र में होती है पहचान कौन कैसा है ये आरज़ू थी मिरे साथ तू सफ़र करता गए दिनों में ये मामूल था मिरा 'तैमूर' ज़ियादा वक़्त मैं इक ख़्वाब में बसर करता
Taimur Hasan
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नहीं उड़ाऊँगा ख़ाक रोया नहीं करूँँगा करूँँगा मैं इश्क़ पर तमाशा नहीं करूँँगा मिरी मोहब्बत भी ख़ास है क्यूँँकि ख़ास हूँ मैं सो आम लोगों में ज़िक्र इस का नहीं करूँँगा उसे बताओ फ़रार का नाम तो नहीं इश्क़ जो कह रहा है मैं कार-ए-दुनिया नहीं करूँँगा कभी न सोचा था गुफ़्तुगू भी करूँँगा घंटों और अपनी बातों में ज़िक्र तेरा नहीं करूँँगा इरादतन जो किया है अब तक ग़लत किया है सो अब कोई काम बिल-इरादा नहीं करूँँगा तुझे मैं अपना नहीं समझता इसी लिए तो ज़माने तुझ से मैं कोई शिकवा नहीं करूँँगा मिरी तवज्जोह फ़क़त मिरे काम पर रहेगी मैं ख़ुद को साबित करूँँगा दावा नहीं करूँँगा अगर मैं हारा तो मान लूँगा शिकस्त अपनी तिरी तरह से कोई बहाना नहीं करूँँगा अगर किसी मस्लहत में पीछे हटा हूँ 'तैमूर' तो मत समझना कि अब मैं हमला नहीं करूँँगा
Taimur Hasan
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वफ़ा का ज़िक्र छिड़ा था कि रात बीत गई अभी तो रंग जमा था कि रात बीत गई मिरी तरफ़ चली आती है नींद ख़्वाब लिए अभी ये मुज़्दा सुना था कि रात बीत गई मैं रात ज़ीस्त का क़िस्सा सुनाने बैठ गया अभी शुरूअ किया था कि रात बीत गई यहाँ तो चारों तरफ़ अब तलक अँधेरा है किसी ने मुझ से कहा था कि रात बीत गई ये क्या तिलिस्म ये पल भर में रात आ भी गई अभी तो मैं ने सुना था कि रात बीत गई शब आज की वो मिरे नाम करने वाला है ये इंकिशाफ़ हुआ था कि रात बीत गई नवेद-ए-सुब्ह जो सब को सुनाता फिरता था वो मुझ से पूछ रहा था कि रात बीत गई उठे थे हाथ दुआ के लिए कि रात कटे दुआ में ऐसा भी क्या था कि रात बीत गई ख़ुशी ज़रूर थी 'तैमूर' दिन निकलने की मगर ये ग़म भी सिवा था कि रात बीत गई
Taimur Hasan
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हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं अपने साथ इक शाम मनाया करते हैं सूरज के उस जानिब बसने वाले लोग अक्सर हम को पास बुलाया करते हैं यूँँही ख़ुद से रूठा करते हैं पहले देर तलक फिर ख़ुद को मनाया करते हैं चुप रहते हैं उस के सामने जा कर हम यूँँ उस को चख याद दिलाया करते हैं नींदों के वीरान जज़ीरे पर हर शब ख़्वाबों का इक शहर बसाया करते हैं इन ख़्वाबों की क़ीमत हम से पूछ कि हम इन के सहारे उम्र बिताया करते हैं अब तो कोई भी दूर नहीं तो फिर 'तैमूर' हम ख़त किस के नाम लिखाया करते हैं
Taimur Hasan
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मोती नहीं हूँ रेत का ज़र्रा तो मैं भी हूँ दरिया तिरे वजूद का हिस्सा तो मैं भी हूँ ऐ क़हक़हे बिखेरने वाले तू ख़ुश भी है हँसने की बात छोड़ कि हँसता तो मैं भी हूँ मुझ में और उस में सिर्फ़ मुक़द्दर का फ़र्क़ है वर्ना वो शख़्स जितना है उतना तो मैं भी हूँ उस की तू सोच दुनिया में जिस का कोई नहीं तू किस लिए उदास है तेरा तो मैं भी हूँ इक एक कर के डूबते तारे बुझा गए मुझ को भी डूबना है सितारा तो मैं भी हूँ इक आइने में देख के आया है ये ख़याल मैं क्यूँँ न उस से कह दूँ कि तुझ सा तो मैं भी हूँ
Taimur Hasan
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