तुम न मानो मगर हक़ीक़त है इश्क़ इंसान की ज़रूरत है जी रहा हूँ इस ए'तिमाद के साथ ज़िंदगी को मिरी ज़रूरत है हुस्न ही हुस्न जल्वे ही जल्वे सिर्फ़ एहसास की ज़रूरत है उस के वादे पे नाज़ थे क्या क्या अब दर-ओ-बाम से नदामत है उस की महफ़िल में बैठ कर देखो ज़िंदगी कितनी ख़ूब-सूरत है रास्ता कट ही जाएगा 'क़ाबिल' शौक़-ए-मंज़िल अगर सलामत है
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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अब ये आलम है कि ग़म की भी ख़बर होती नहीं अश्क बह जाते हैं लेकिन आँख तर होती नहीं फिर कोई कम-बख़्त कश्ती नज़र-ए-तूफ़ाँ हो गई वर्ना साहिल पर उदासी इस क़दर होती नहीं तेरा अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल है जुनूँ में आज कल चाक कर लेता हूँ दामन और ख़बर होती नहीं हाए किस आलम में छोड़ा है तुम्हारे ग़म ने साथ जब क़ज़ा भी ज़िंदगी की चारा-गर होती नहीं रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इंक़लाब चंद शम्ओं के भड़कने से सहर होती नहीं इज़्तिराब-ए-दिल से 'क़ाबिल' वो निगाह-ए-बे-नियाज़ बे-ख़बर मालूम होती है मगर होती नहीं
Qabil Ajmeri
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वो कब आएँ ख़ुदा जाने सितारो तुम तो सो जाओ हुए हैं हम तो दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ कहाँ तक मुझ से हमदर्दी कहाँ तक मेरी ग़म-ख़्वारी हज़ारों ग़म हैं अनजाने सितारो तुम तो सो जाओ गुज़र जाएगी ग़म की रात उम्मीदो तो जाग उट्ठो सँभल जाएँगे दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ हमें रूदाद-ए-हस्ती रात भर में ख़त्म करनी है न छेड़ो और अफ़्साने सितारो तुम तो सो जाओ हमारे दीदा-ए-बे-ख़्वाब को तस्कीन क्या दोगे हमें लूटा है दुनिया ने सितारो तुम तो सो जाओ उसे 'क़ाबिल' की चश्म-ए-नम से देरीना तअ'ल्लुक़ है शब-ए-ग़म तुम को क्या जाने सितारो तुम तो सो जाओ
Qabil Ajmeri
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हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए हम नज़र तक चाहते थे तुम तो जाँ तक आ गए ना-मुरादी अपनी क़िस्मत गुमरही अपना नसीब कारवाँ की ख़ैर हो हम कारवाँ तक आ गए उन की पलकों पर सितारे अपने होंटों पे हँसी क़िस्सा-ए-ग़म कहते कहते हम कहाँ तक आ गए ज़ुल्फ़ में ख़ुशबू न थी या रंग आरिज़ में न था आप किस की आरज़ू में गुल्सिताँ तक आ गए रफ़्ता रफ़्ता रंग लाया जज़्बा-ए-ख़ामोश-ए-इश्क़ वो तग़ाफ़ुल करते करते इम्तिहाँ तक आ गए ख़ुद तुम्हें चाक-ए-गरेबाँ का शुऊ'र आ जाएगा तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए आज 'क़ाबिल' मय-कदे में इंक़लाब आने को है अहल-ए-दिल अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ तक आ गए
Qabil Ajmeri
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