ghazalKuch Alfaaz

हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए हम नज़र तक चाहते थे तुम तो जाँ तक आ गए ना-मुरादी अपनी क़िस्मत गुमरही अपना नसीब कारवाँ की ख़ैर हो हम कारवाँ तक आ गए उन की पलकों पर सितारे अपने होंटों पे हँसी क़िस्सा-ए-ग़म कहते कहते हम कहाँ तक आ गए ज़ुल्फ़ में ख़ुशबू न थी या रंग आरिज़ में न था आप किस की आरज़ू में गुल्सिताँ तक आ गए रफ़्ता रफ़्ता रंग लाया जज़्बा-ए-ख़ामोश-ए-इश्क़ वो तग़ाफ़ुल करते करते इम्तिहाँ तक आ गए ख़ुद तुम्हें चाक-ए-गरेबाँ का शुऊ'र आ जाएगा तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए आज 'क़ाबिल' मय-कदे में इंक़लाब आने को है अहल-ए-दिल अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ तक आ गए

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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अब ये आलम है कि ग़म की भी ख़बर होती नहीं अश्क बह जाते हैं लेकिन आँख तर होती नहीं फिर कोई कम-बख़्त कश्ती नज़र-ए-तूफ़ाँ हो गई वर्ना साहिल पर उदासी इस क़दर होती नहीं तेरा अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल है जुनूँ में आज कल चाक कर लेता हूँ दामन और ख़बर होती नहीं हाए किस आलम में छोड़ा है तुम्हारे ग़म ने साथ जब क़ज़ा भी ज़िंदगी की चारा-गर होती नहीं रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इंक़लाब चंद शम्ओं के भड़कने से सहर होती नहीं इज़्तिराब-ए-दिल से 'क़ाबिल' वो निगाह-ए-बे-नियाज़ बे-ख़बर मालूम होती है मगर होती नहीं

Qabil Ajmeri

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वो कब आएँ ख़ुदा जाने सितारो तुम तो सो जाओ हुए हैं हम तो दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ कहाँ तक मुझ से हमदर्दी कहाँ तक मेरी ग़म-ख़्वारी हज़ारों ग़म हैं अनजाने सितारो तुम तो सो जाओ गुज़र जाएगी ग़म की रात उम्मीदो तो जाग उट्ठो सँभल जाएँगे दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ हमें रूदाद-ए-हस्ती रात भर में ख़त्म करनी है न छेड़ो और अफ़्साने सितारो तुम तो सो जाओ हमारे दीदा-ए-बे-ख़्वाब को तस्कीन क्या दोगे हमें लूटा है दुनिया ने सितारो तुम तो सो जाओ उसे 'क़ाबिल' की चश्म-ए-नम से देरीना तअ'ल्लुक़ है शब-ए-ग़म तुम को क्या जाने सितारो तुम तो सो जाओ

Qabil Ajmeri

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तुम न मानो मगर हक़ीक़त है इश्क़ इंसान की ज़रूरत है जी रहा हूँ इस ए'तिमाद के साथ ज़िंदगी को मिरी ज़रूरत है हुस्न ही हुस्न जल्वे ही जल्वे सिर्फ़ एहसास की ज़रूरत है उस के वादे पे नाज़ थे क्या क्या अब दर-ओ-बाम से नदामत है उस की महफ़िल में बैठ कर देखो ज़िंदगी कितनी ख़ूब-सूरत है रास्ता कट ही जाएगा 'क़ाबिल' शौक़-ए-मंज़िल अगर सलामत है

Qabil Ajmeri

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