ghazalKuch Alfaaz

विकट बाढ़ की करुण कहानी नदियों का संन्यास लिखा है बूढ़े बरगद के वल्कल पर सदियों का इतिहास लिखा है क्रूर नियति ने इस की किस्मत से कैसा खिलवाड़ किया है मन के पृष्ठों पर शाकुंतल अधरों पर संत्रास लिखा है छाया मदिर महकती रहती गोया तुलसी की चौपाई लेकिन स्वप्निल स्मृतियों में सीता का वनवास लिखा है नागफनी जो उगा रहे हैं गमलों में गुलाब के बदले शाखों पर उस शापित पीढ़ी का खंडित विश्वास लिखा है लू के गर्म झकोरों से जब पछुआ तन को झुलसा जाती इसने मेरे तनहाई के मरुथल में मधुमास लिखा है अर्धतृप्ति उद्दाम वासना ये मानव जीवन का सच है धरती के इस खंडकाव्य पर विरहदग्ध उच्छ्वास लिखा है

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दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस जो तअल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा हम तेरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप -चाप हम तो ये ध्यान में लेट हुए मर जाते हैं उन के भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले 'ताबिश ' जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं

Abbas Tabish

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यूँँ अपनी प्यास की ख़ुद ही कहानी लिख रहे थे हम सुलगती रेत पे उँगली से पानी लिख रहे थे हम मियाँ बस मौत ही सच है वहाँ ये लिख गया कोई जहाँ पर ज़िंदगानी ज़िंदगानी लिख रहे थे हम मिले तुझ से तो दुनिया को सुहानी लिख दिया हम ने वगर्ना कब से उस को बे-मआ'नी लिख रहे थे हम हमीं पे गिर पड़ी कल रात वो दीवार रो रो कर कि जिस पे अपने माज़ी की कहानी लिख रहे थे हम

Varun Anand

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सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए

Rahat Indori

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मेरे ग़म को जो अपना बताते रहे वक़्त पड़ने पे हाथों से जाते रहे बारिशें आईं और फ़ैसला कर गईं लोग टूटी छतें आज़माते रहे आँखें मंज़र हुईं कान नग़्मा हुए घर के अंदाज़ ही घर से जाते रहे शाम आई तो बिछड़े हुए हम-सफ़र आँसुओं से इन आँखों में आते रहे नन्हे बच्चों ने छू भी लिया चाँद को बूढ़े बाबा कहानी सुनाते रहे दूर तक हाथ में कोई पत्थर न था फिर भी हम जाने क्यूँँ सर बचाते रहे शा'इरी ज़हर थी क्या करें ऐ 'वसीम' लोग पीते रहे हम पिलाते रहे

Waseem Barelvi

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ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना मगर फिर ख़ुद-ब-ख़ुद वो आप का गुलनार हो जाना किसी दिन मेरी रुस्वाई का ये कारन न बन जाए तुम्हारा शहर से जाना मिरा बीमार हो जाना वो अपना जिस्म सारा सौंप देना मेरी आँखों को मिरी पढ़ने की कोशिश आप का अख़बार हो जाना कभी जब आँधियाँ चलती हैं हम को याद आता है हवा का तेज़ चलना आप का दीवार हो जाना बहुत दुश्वार है मेरे लिए उस का तसव्वुर भी बहुत आसान है उस के लिए दुश्वार हो जाना किसी की याद आती है तो ये भी याद आता है कहीं चलने की ज़िद करना मिरा तय्यार हो जाना कहानी का ये हिस्सा अब भी कोई ख़्वाब लगता है तिरा सर पर बिठा लेना मिरा दस्तार हो जाना मोहब्बत इक न इक दिन ये हुनर तुम को सिखा देगी बग़ावत पर उतरना और ख़ुद-मुख़्तार हो जाना नज़र नीची किए उस का गुज़रना पास से मेरे ज़रा सी देर रुकना फिर सबा-रफ़्तार हो जाना

Munawwar Rana

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