ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना मगर फिर ख़ुद-ब-ख़ुद वो आप का गुलनार हो जाना किसी दिन मेरी रुस्वाई का ये कारन न बन जाए तुम्हारा शहर से जाना मिरा बीमार हो जाना वो अपना जिस्म सारा सौंप देना मेरी आँखों को मिरी पढ़ने की कोशिश आप का अख़बार हो जाना कभी जब आँधियाँ चलती हैं हम को याद आता है हवा का तेज़ चलना आप का दीवार हो जाना बहुत दुश्वार है मेरे लिए उस का तसव्वुर भी बहुत आसान है उस के लिए दुश्वार हो जाना किसी की याद आती है तो ये भी याद आता है कहीं चलने की ज़िद करना मिरा तय्यार हो जाना कहानी का ये हिस्सा अब भी कोई ख़्वाब लगता है तिरा सर पर बिठा लेना मिरा दस्तार हो जाना मोहब्बत इक न इक दिन ये हुनर तुम को सिखा देगी बग़ावत पर उतरना और ख़ुद-मुख़्तार हो जाना नज़र नीची किए उस का गुज़रना पास से मेरे ज़रा सी देर रुकना फिर सबा-रफ़्तार हो जाना
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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे
Kumar Vishwas
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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं
Jaun Elia
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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बात मैं सरसरी नहीं करता और वज़ाहत कभी नहीं करता एक ही बात मुझ में अच्छी है और मैं बस वही नहीं करता मुझ को कैसे मिले भला फ़ुर्सत मैं कोई काम ही नहीं करता आप ही लोग मार देते हैं कोई भी ख़ुद-कुशी नहीं करता एक जुगनू है तेरी यादों का जो कभी रौशनी नहीं करता
Ammar Iqbal
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है
Munawwar Rana
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छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली सल्तनत तक मिरे इनआ'म में बिक जाती है शे'र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है वो सियासत का इलाक़ा है उधर मत जाना आबरू कूचा-ए-बद-नाम में बिक जाती है
Munawwar Rana
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ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत कब तलक देखिए रखता है वो आबाद मुझे एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे कम से कम ये तो बता दे कि किधर जाएगी कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है मेरे जिस शे'र पे मिलती है बहुत दाद मुझे
Munawwar Rana
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दुनिया तिरी रौनक़ से मैं अब ऊब रहा हूँ तू चाँद मुझे कहती थी मैं डूब रहा हूँ अब कोई शनासा भी दिखाई नहीं देता बरसों मैं इसी शहर का महबूब रहा हूँ मैं ख़्वाब नहीं आप की आँखों की तरह था मैं आप का लहजा नहीं उस्लूब रहा हूँ रुस्वाई मिरे नाम से मंसूब रही है मैं ख़ुद कहाँ रुस्वाई से मंसूब रहा हूँ सच्चाई तो ये है कि तिरे क़र्या-ए-दिल में इक वो भी ज़माना था कि मैं ख़ूब रहा हूँ उस शहर के पत्थर भी गवाही मिरी देंगे सहरा भी बता देगा कि मज्ज़ूब रहा हूँ दुनिया मुझे साहिल से खड़ी देख रही है मैं एक जज़ीरे की तरह डूब रहा हूँ शोहरत मुझे मिलती है तो चुप-चाप खड़ी रह रुस्वाई मैं तुझ से भी तो मंसूब रहा हूँ फेंक आए थे मुझ को भी मिरे भाई कुएँ में मैं सब्र में भी हज़रत-ए-अय्यूब रहा हूँ
Munawwar Rana
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मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो'तबर हो जाऊँ बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ
Munawwar Rana
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