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वो जो सूरत थी साथ साथ कभी सुर्ख़ महके गुलाब की सूरत उस की यादें उतरती रहती हैं ज़ेहन-ओ-दिल पे अज़ाब की सूरत ये रवय्या सही नहीं होता यूँँ हमें कश्मकश में मत डालो या हमें सच की तरह अपना लो या भुला भी दो ख़्वाब की सूरत उस ने अन-देखा अन-सुना कर के बे-तअल्लुक़ किया है तो अब हम उस की तस्वीर से निकालेंगे आँसुओं के हिसाब की सूरत अपनी झूटी अना की बातों में आ के उस को सुला तो बैठे हैं अब हैं सहराओं के मुसाफ़िर हम और वो सूरत सराब की सूरत

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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इस तरह से तर्जुमानी कर गया मेरे अश्कों को वो पानी कर गया उस ने चेहरे से हटा डाला नक़ाब और मेरी ग़ज़लें पुरानी कर गया रख गया वो अपने कपड़े सूखने धूप भी कितनी सुहानी कर गया भूल जाने की क़सम देना तेरा याद आने की निशानी कर गया दो घड़ी को पास आया था कोई दिल पे बरसों हुक्मरानी कर गया जिस पे मैं ईमान ले आया 'असद' मुझ से वो ही बे-ईमानी कर गया

Subhan Asad

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रग-ए-जाँ में समा जाती हो जानाँ तुम इतना याद क्यूँँ आती हो जानाँ तुम्हारे साए है पहलू में अब तक कि जा कर भी कहाँ जाती हो जानाँ मिरी नींदें उड़ा रक्खी हैं तुम ने ये कैसे ख़्वाब दिखलाती हो जानाँ किसी दिन देखना मर जाऊँगा मैं मिरी क़स्में बहुत खाती हो जानाँ वो सुनता हूँ मैं अपनी धड़कनों से तुम आँखों से जो कह जाती हो जानाँ पराया-पन नहीं अपनाइयत है जो यूँँ आँखें चुरा जाती हो जानाँ

Subhan Asad

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मुझे मलाल में रखना ख़ुशी तुम्हारी थी मगर मैं ख़ुश हूँ कि वाबस्तगी तुम्हारी थी बिछड़ के तुम से ख़िज़ाँ हो गए तो ये जाना हमारे हुस्न में सब दिलकशी तुम्हारी थी ब-नाम-ए-शर्त-ए-मोहब्बत ये अश्क बहने दो हमें ख़बर है कि जो बेबसी तुम्हारी थी वो सिर्फ़ मैं तो नहीं था जो हिज्र में रोया वो कैफ़ियत जो मिरी थी वही तुम्हारी थी गिला नहीं कि मिरे हाल पर हँसी दुनिया गिला तो ये है कि पहली हँसी तुम्हारी थी

Subhan Asad

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इस का ग़म है कि मुझे वहम हुआ है शायद कोई पहलू में मिरे जाग रहा है शायद जागते जागते पिछली कई रातें गुज़री चाँद होना मिरी क़िस्मत में लिखा है शायद दौड़ जाऊँ हर इक आहट पे किवाड़ों की तरफ़ और फिर ख़ुद को ही समझाऊँ हवा है शायद उस की बातों से वो अब फूल नहीं झड़ते हैं उस के होंटों पे अभी मेरा गिला है शायद उस को खोलूँ तो रग-ए-दिल को कोई डसता है याद की गठरी में इक साँप छुपा है शायद मुझ को हर राह उजालों से भरी मिलती है ये उन आँखों के चराग़ों की दुआ है शायद

Subhan Asad

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दर्द के दाइमी रिश्तों से लिपट जाते हैं अक्स रोते हैं तो शीशों से लिपट जाते हैं हाए वो लोग जिन्हें हम ने भुला रक्खा है याद आते हैं तो साँसों से लिपट जाते हैं किस के पैरों के निशाँ हैं कि मुसाफ़िर भी अब मंज़िलें भूल के रस्तों से लिपट जाते हैं जब वो रोता है तो यक-लख़्त मिरी प्यास के होंट उस की आँखों के किनारों से लिपट जाते हैं जब उन्हें नींद पनाहें नहीं देती हैं 'असद' ख़्वाब फिर जागती आँखों से लिपट जाते हैं

Subhan Asad

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