ye nazuk si mire andar ki ladki ajab jazbe ajab tevar ki ladki yunhi zakhmi nahin hain haath mere tarashi main ne ik patthar ki ladki khadi hai fikr ke azar-kade men burida-dast phir aazar ki ladki ana khoi to kudh kar mar gai vo badi hassas thi andar ki ladki sazavar-e-hunar mujh ko na thahra ye fan mera na main aazar ki ladki bikhar kar shisha shisha reza reza simat kar phuul se paikar ki ladki haveli ke makin to chahte the ki ghar hi men rahe ye ghar ki ladki ye nazuk si mere andar ki ladki ajab jazbe ajab tewar ki ladki yunhi zakhmi nahin hain hath mere tarashi main ne ek patthar ki ladki khadi hai fikr ke aazar-kade mein burida-dast phir aazar ki ladki ana khoi to kudh kar mar gai wo badi hassas thi andar ki ladki sazawar-e-hunar mujh ko na thahra ye fan mera na main aazar ki ladki bikhar kar shisha shisha reza reza simat kar phul se paikar ki ladki haweli ke makin to chahte the ki ghar hi mein rahe ye ghar ki ladki
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो सरकारी एलान हुआ है सच बोलो घर के अंदर तो झूठों की एक मंडी है दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो गुलदस्ते पर यकजहती लिख रक्खा है गुलदस्ते के अंदर क्या है सच बोलो गंगा मइया डूबने वाले अपने थे नाव में किस ने छेद किया है सच बोलो
Rahat Indori
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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मैं ने तो बस मज़ाक़ में पूछा ख़राब है? वो पीर हाथ देख के बोला ख़राब है हर दिन उसे दिखाया कि कितने शरीफ़ हैं हर रात उस के बारे में सोचा ख़राब है ये इश्क़ हो चुका है तुरुप-चाल ताश की आगे ग़ुलाम के मिरा इक्का ख़राब है आज़ाद लड़कियों से भली क़ैद औरतें मतलब कि झील ठीक है दरिया ख़राब है हम जिस ख़ुदा की आस में बैठे हैं रात दिन वो जा चुका है बोल के दुनिया ख़राब है ज़्यादा किसी की मौत पे रोना नहीं सही और जन्मदिन पे शोर शराबा ख़राब है आधा भी उस के जितना मैं रौशन नहीं हुआ मैं जिस दिए को बोल रहा था ख़राब है
Kushal Dauneria
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