ghazalKuch Alfaaz

ज़ख़्म पर छिड़कें कहाँ तिफ़्लान-ए-बे-परवा नमक क्या मज़ा होता अगर पत्थर में भी होता नमक गर्द-ए-राह-ए-यार है सामान-ए-नाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल वर्ना होता है जहाँ में किस क़दर पैदा नमक मुझ को अर्ज़ानी रहे तुझ को मुबारक होजियो नाला-ए-बुलबुल का दर्द और ख़ंदा-ए-गुल का नमक शोर-ए-जौलाँ था कनार-ए-बहर पर किस का कि आज गर्द-ए-साहिल है ब-ज़ख़्म-ए-मौज-ए-दरिया नमक दाद देता है मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर की वाह वाह याद करता है मुझे देखे है वो जिस जा नमक छोड़ कर जाना तन-ए-मजरूह-ए-आशिक़ हैफ़ है दिल तलब करता है ज़ख़्म और माँगे हैं आ'ज़ा नमक ग़ैर की मिन्नत न खींचूँगा पय-ए-तौफ़ीर-ए-दर्द ज़ख़्म मिस्ल-ए-ख़ंदा-ए-क़ातिल है सर-ता-पा नमक याद हैं 'ग़ालिब' तुझे वो दिन कि वज्द-ए-ज़ौक़ में ज़ख़्म से गिरता तो मैं पलकों से चुनता था नमक इस अमल में ऐश की लज़्ज़त नहीं मिलती 'असद' ज़ोर निस्बत मय से रखता है अज़ारा का नमक

Related Ghazal

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

130 likes

उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

107 likes

More from Mirza Ghalib

हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़ दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़ न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़ विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़ हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़ न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब' जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़ फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़ ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़ हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़ 'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़ हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़

Mirza Ghalib

0 likes

हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन वर्ना हम छेड़ेंगे रख कर उज़्र-ए-मस्ती एक दिन ग़र्रा-ए-औज-ए-बिना-ए-आलम-ए-इमकाँ न हो इस बुलंदी के नसीबों में है पस्ती एक दिन क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन नग़्मा-हा-ए-ग़म को भी ऐ दिल ग़नीमत जानिए बे-सदा हो जाएगा ये साज़-ए-हस्ती एक दिन धौल-धप्पा उस सरापा-नाज़ का शेवा नहीं हम ही कर बैठे थे 'ग़ालिब' पेश-दस्ती एक दिन

Mirza Ghalib

1 likes

हैराँ हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं मक़्दूर हो तो साथ रखूँ नौहागर को मैं छोड़ा न रश्क ने कि तिरे घर का नाम लूँ हर इक से पूछता हूँ कि जाऊँ किधर को मैं जाना पड़ा रक़ीब के दर पर हज़ार बार ऐ काश जानता न तिरे रह-गुज़र को मैं है क्या जो कस के बाँधिए मेरी बला डरे क्या जानता नहीं हूँ तुम्हारी कमर को मैं लो वो भी कहते हैं कि ये बे-नंग-ओ-नाम है ये जानता अगर तो लुटाता न घर को मैं चलता हूँ थोड़ी दूर हर इक तेज़-रौ के साथ पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को मैं ख़्वाहिश को अहमक़ों ने परस्तिश दिया क़रार क्या पूजता हूँ उस बुत-ए-बेदाद-गर को मैं फिर बे-ख़ुदी में भूल गया राह-ए-कू-ए-यार जाता वगर्ना एक दिन अपनी ख़बर को मैं अपने पे कर रहा हूँ क़यास अहल-ए-दहर का समझा हूँ दिल-पज़ीर मता-ए-हुनर को मैं 'ग़ालिब' ख़ुदा करे कि सवार-ए-समंद-नाज़ देखूँ अली बहादुर-ए-आली-गुहर को मैं

Mirza Ghalib

3 likes

ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम ज़ोफ़ से है ने क़नाअ'त से ये तर्क-ए-जुस्तुजू हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद' जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ' पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम

Mirza Ghalib

0 likes

घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है कि अगर तंग न होता तो परेशाँ होता बा'द यक-उम्र-ए-वरा' बार तो देता बारे काश रिज़वाँ ही दर-ए-यार का दरबाँ होता

Mirza Ghalib

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Mirza Ghalib.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Mirza Ghalib's ghazal.