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zindagi se ek din mausam khafa ho jaenge rang-e-gul aur bu-e-gul donon hava ho jaenge aankh se aansu nikal jaenge aur tahni se phuul vaqt badlega to sab qaidi riha ho jaenge phuul se khushbu bichhad jaegi suraj se kiran saal se din vaqt se lamhe juda ho jaenge kitne pur-ummid kitne khub-surat hain ye log kya ye sab baazu ye sab chehre fana ho jaenge zindagi se ek din mausam khafa ho jaenge rang-e-gul aur bu-e-gul donon hawa ho jaenge aankh se aansu nikal jaenge aur tahni se phul waqt badlega to sab qaidi riha ho jaenge phul se khushbu bichhad jaegi suraj se kiran sal se din waqt se lamhe juda ho jaenge kitne pur-ummid kitne khub-surat hain ye log kya ye sab bazu ye sab chehre fana ho jaenge

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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वो एक पक्षी जो गुंजन कर रहा है वो मुझ में प्रेम सृजन कर रहा है बहुत दिन हो गए है तुम सेे बिछड़े तुम्हें मिलने को अब मन कर रहा है नदी के शांत तट पर बैठ कर मन तेरी यादें विसर्जन कर रहा है

Azhar Iqbal

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हर अँधेरा रौशनी में लग गया जिस को देखो शा'इरी में लग गया हम को मर जाने की फ़ुर्सत कब मिली वक़्त सारा ज़िन्दगी में लग गया अपना मैख़ाना बना सकते थे हम इतना पैसा मैकशी में लग गया ख़ुद से इतनी दूर जा निकले थे हम इक ज़माना वापसी में लग गया

Mehshar Afridi

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हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र-ओ-शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना था कि पर लग गए रुस्वाई को निगह-ए-नाज़ न मिलते हुए घबरा हम से हम मोहब्बत नहीं कहने के शनासाई को दिल है नैरंगी-ए-अय्याम पे हैराँ अब तक इतनी सी बात भी मालूम नहीं भाई को

Ahmad Mushtaq

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ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं ख़ाली काग़ज़ पर लकीरें खींचता रहता हूँ मैं आज से मुझ पर मुकम्मल हो गया दीन-ए-फ़िराक़ हाँ तसव्वुर में भी अब तुझ से जुदा रहता हूँ मैं तू दयार-ए-हुस्न है ऊँची रहे तेरी फ़सील मैं हूँ दरवाज़ा मोहब्बत का, खुला रहता हूँ मैं शाम तक खींचे लिए फिरते हैं इस दुनिया के काम सुब्ह तक फ़र्श-ए-नदामत पर पड़ा रहता हूँ मैं हाँ कभी मुझ पर भी हो जाता है मौसम का असर हाँ किसी दिन शाकी-ए-आब-ओ-हवा रहता हूँ मैं अहल-ए-दुनिया से तअ'ल्लुक़ क़त्अ होता ही नहीं भूल जाने पर भी सूरत-आश्ना रहता हूँ मैं

Ahmad Mushtaq

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किस झुट-पुटे के रंग उजालों में आ गए टुकड़े शफ़क़ के धूप से गालों में आ गए अफ़्सुर्दगी की लय भी तिरे क़हक़हों में थी पतझड़ के सुर बहार के झालों में आ गए उड़ कर कहाँ कहाँ से परिंदों के क़ाफ़िले नादीदा पानियों के ख़यालों में आ गए हुस्न-ए-तमाम थे तो कोई देखता न था तुम दर्द बन के देखने वालों में आ गए काँटे समझ के घास पे चलता रहा हूँ मैं क़तरे तमाम ओस के छालों में आ गए कुछ रत-जगे थे जिन की ज़रूरत नहीं रही कुछ ख़्वाब थे जो मेरे ख़यालों में आ गए

Ahmad Mushtaq

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इश्क़ में कौन बता सकता है किस ने किस से सच बोला है हम तुम साथ हैं इस लम्हे में दुख सुख तो अपना अपना है मुझ को तो सारे नामों में तेरा नाम अच्छा लगता है भूल गई वो शक्ल भी आख़िर कब तक याद कोई रहता है

Ahmad Mushtaq

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तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ तुम्हारे साथ भी कुछ दूर जा कर देख लेता हूँ हवाएँ जिन की अंधी खिड़कियों पर सर पटकती हैं मैं उन कमरों में फिर शमएँ जला कर देख लेता हूँ अजब क्या इस क़रीने से कोई सूरत निकल आए तिरी बातों को ख़्वाबों से मिला कर देख लेता हूँ सहर-ए-दम किर्चियाँ टूटे हुए ख़्वाबों की मिलती हैं तो बिस्तर झाड़ कर चादर हटा कर देख लेता हूँ बहुत दिल को दुखाता है कभी जब दर्द-ए-महजूरी तिरी यादों की जानिब मुस्कुरा कर देख लेता हूँ उड़ा कर रंग कुछ होंटों से कुछ आँखों से कुछ दिल से गए लम्हों को तस्वीरें बना कर देख लेता हूँ नहीं हो तुम भी वो अब मुझ से यारो क्या छुपाओगे हवा की सम्त को मिट्टी उड़ा कर देख लेता हूँ सुना है बे-नियाज़ी ही इलाज-ए-ना-उमीदी है ये नुस्ख़ा भी कोई दिन आज़मा कर देख लेता हूँ मोहब्बत मर गई 'मुश्ताक़' लेकिन तुम न मानोगे मैं ये अफ़्वाह भी तुम को सुना कर देख लेता हूँ

Ahmad Mushtaq

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