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इश्क़ में कौन बता सकता है किस ने किस से सच बोला है हम तुम साथ हैं इस लम्हे में दुख सुख तो अपना अपना है मुझ को तो सारे नामों में तेरा नाम अच्छा लगता है भूल गई वो शक्ल भी आख़िर कब तक याद कोई रहता है

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं ख़ाली काग़ज़ पर लकीरें खींचता रहता हूँ मैं आज से मुझ पर मुकम्मल हो गया दीन-ए-फ़िराक़ हाँ तसव्वुर में भी अब तुझ से जुदा रहता हूँ मैं तू दयार-ए-हुस्न है ऊँची रहे तेरी फ़सील मैं हूँ दरवाज़ा मोहब्बत का, खुला रहता हूँ मैं शाम तक खींचे लिए फिरते हैं इस दुनिया के काम सुब्ह तक फ़र्श-ए-नदामत पर पड़ा रहता हूँ मैं हाँ कभी मुझ पर भी हो जाता है मौसम का असर हाँ किसी दिन शाकी-ए-आब-ओ-हवा रहता हूँ मैं अहल-ए-दुनिया से तअ'ल्लुक़ क़त्अ होता ही नहीं भूल जाने पर भी सूरत-आश्ना रहता हूँ मैं

Ahmad Mushtaq

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अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए इश्क़-ओ-हवस हैं सब फ़रेब आप से क्या छुपाइए उस ने कहा कि याद हैं रंग तुलू-ए-इश्क़ के मैं ने कहा कि छोड़िए अब उन्हें भूल जाइए कैसे नफ़ीस थे मकाँ साफ़ था कितना आसमाँ मैं ने कहा कि वो समाँ आज कहाँ से लाइए कुछ तो सुराग़ मिल सके मौसम-ए-दर्द-ए-हिज्र का संग-ए-जमाल-ए-यार पर नक़्श कोई बनाइए कोई शरर नहीं बचा पिछले बरस की राख में हम-नफ़्सान-ए-शो'ला-ख़ू आग नई जलाइए

Ahmad Mushtaq

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ये कौन ख़्वाब में छू कर चला गया मिरे लब पुकारता हूँ तो देते नहीं सदा मिरे लब ये और बात किसी के लबों तलक न गए मगर क़रीब से गुज़रे हैं बार-हा मिरे लब अब उस की शक्ल भी मुश्किल से याद आती है वो जिस के नाम से होते न थे जुदा मिरे लब अब एक उमर से गुफ़्त-ओ-शुनीद भी तो नहीं हैं बे-नसीब मिरे कान बे-नवा मिरे लब ये शाख़साना-ए-वहम-ओ-गुमान था शायद कुजा वो समरा-ए-बाग़-ए-तलब कुजा मिरे लब

Ahmad Mushtaq

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हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र-ओ-शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना था कि पर लग गए रुस्वाई को निगह-ए-नाज़ न मिलते हुए घबरा हम से हम मोहब्बत नहीं कहने के शनासाई को दिल है नैरंगी-ए-अय्याम पे हैराँ अब तक इतनी सी बात भी मालूम नहीं भाई को

Ahmad Mushtaq

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कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है कि थरथरी सी अजब जिस्म-ओ-जाँ में रहती है क़दम क़दम पे वही चश्म ओ लब वही गेसू तमाम उम्र नज़र इम्तिहाँ में रहती है मज़ा तो ये है कि वो ख़ुद तो है नए घर में और उस की याद पुराने मकाँ में रहती है पता तो फ़स्ल-ए-गुल-ओ-लाला का नहीं मालूम सुना है क़ुर्ब-ओ-जवार-ए-ख़िज़ाँ में रहती है मैं कितना वहम करूँँ लेकिन इक शुआ-ए-यक़ीं कहीं नवाह-ए-दिल-ए-बद-गुमाँ में रहती है हज़ार जान खपाता रहूँ मगर फिर भी कमी सी कुछ मिरे तर्ज़-ए-बयाँ में रहती है

Ahmad Mushtaq

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