Yaad Mood

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रातें किसी याद में कटती हैं और दिन दफ़्तर खा जाता है दिल जीने पर माएल होता है तो मौत का डर खा जाता है सच पूछो तो 'तहज़ीब हाफ़ी' मैं ऐसे दोस्त से आज़िज़ हूँ मिलता है तो बात नहीं करता और फोन पे सर खा जाता है

Tehzeeb Hafi307 likes

उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी

Ali Zaryoun361 likes

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं

Jaan Nisar Akhtar67 likes

हम को यारों ने याद भी न रखा 'जौन' यारों के यार थे हम तो

Jaun Elia185 likes

यादों की रेल और कहीं जा रही थी फिर ज़ंजीर खींच कर ही उतरना पड़ा मुझे

Zehra Shah45 likes

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता

Mirza Ghalib149 likes

ये शहर-ए-अजनबी में अब किसे जा कर बताएँ हम कहाँ के रहने वाले हैं कहाँ की याद आती है

Ashu Mishra117 likes

तेरा बनता था कि तू दुश्मन हो अपने हाथों से खिलाया था तुझे तेरी गाली से मुझे याद आया कितने तानों से बचाया था तुझे

Ali Zaryoun114 likes

ईद ख़ुशियों का दिन सही लेकिन इक उदासी भी साथ लाती है ज़ख़्म उभरते हैं जाने कब कब के जाने किस किस की याद आती है

Farhat Ehsaas61 likes

तुम उन के वा'दे का ज़िक्र उन से क्यूँँ करो 'ग़ालिब' ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं

Mirza Ghalib123 likes

वो नहीं मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया उसे याद कर के ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया

Bashir Badr67 likes

इक कली की पलकों पर सर्द धूप ठहरी थी इश्क़ का महीना था हुस्न की दुपहरी थी ख़्वाब याद आते हैं और फिर डराते हैं जागना बताता है नींद कितनी गहरी थी

Vikram Gaur Vairagi64 likes

मिन्नतें करता था रुक जाओ मेरा कोई नहीं मेरे रोके से मगर कौन रुका कोई नहीं बेवफ़ाई को बड़ा जुर्म बताने वाले याद है तू ने भी चल छोड़ हटा कोई नहीं

Khan Janbaz45 likes

पहले तो मेरी याद से आई हया उन्हें फिर आइने में चूम लिया अपने-आप को

Shakeb Jalali46 likes

ख़ुद को मसरूफ़ किए रखने की कोशिश करना क्या तेरी याद के ज़ुमरे में नहीं आता है

Jawwad Sheikh44 likes

मैं तो मुद्दत से ग़ैर-हाज़िर हूँ बस मेरा नाम है रजिस्टर में याद करती हैं तुझ को दीवारें शक्ल उभर आई है पलस्तर में

Azhar Nawaz45 likes

परिंदे होते तो डाली पर लौट भी जाते हमें न याद दिलाओ कि शाम हो गई है

Rajesh Reddy46 likes

लंबा हिज्र गुज़ारा तब ये मिलने के पल चार मिले जैसे एक बड़े हफ़्ते में छोटा सा इतवार मिले माना थोड़ा मुश्किल है पर रोज़ दुआ में माँगा है जो मुझ सेे भी ज़्यादा चाहे तुझ को ऐसा यार मिले

Bhaskar Shukla44 likes

आख़िरी बार मैं कब उस से मिला याद नहीं बस यही याद है इक शाम बहुत भारी थी

Hammad Niyazi36 likes

ये भ्रामक प्रकाश ये कल्पित दीप उत्सव दृष्टिहीन हुए तो ये सब पाया है मर्यादा पुरूषोत्तम तो वनवास में है सन्यासी के भेष में रावण आया है

Azhar Iqbal49 likes

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