आती है याद मुझ को तिरी शॉल की महक सब कुछ भुला दिया है तिरी शॉल के सिवा
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तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल हार जाने का हौसला है मुझे
Ahmad Faraz
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प्यार दो बार थोड़ी होता है हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है यही बेहतर है तुम उसे रोको मुझ सेे इनकार थोड़ी होता है
Zubair Ali Tabish
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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ये शहर-ए-अजनबी में अब किसे जा कर बताएँ हम कहाँ के रहने वाले हैं कहाँ की याद आती है
Ashu Mishra
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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यूँँ टुकड़ों में दहलीज़ बना लेने से घर की दीवारें रौनक़ खो बैठी है
salman khan "samar"
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तुम माँग अगर लेते तो जान भी दे देता छीना है मिरा हक़ क्यूँँ मुझ को ये शिकायत है
salman khan "samar"
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सब सेे ज़्यादा दाम दूँगा इश्क़ अपना बेचना तुम
salman khan "samar"
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ये पता चलता आज़माने पर कौन रोता है दूर जाने पर मैं अलग हूँ ज़रा ज़माने से मुस्कुराता हूँ मैं सताने पर
salman khan "samar"
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सामने मेरे वो बैठा था मगर ख़ामोश था और मैं उस के बोल सुनने को बड़ा बेताब था
salman khan "samar"
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